विज्ञापन

भवानीप्रसाद मिश्र: यह तो हो सकता है कि थक जाऊं मैं लिखने-पढ़ने से

काव्य डेस्क

Kavita
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            


यह तो हो सकता है
कि थक जाऊं मैं लिखने-पढ़ने से

कवि की तरह दिखने से
अच्छा मानता हूँ मैं किसी का भी
किसान या बुनकर दिखना

गीत लिखने से अच्छा मानता हूँ मैं
लिखना फ़सलें ज़मीन के टुकड़े पर

अपने टुकड़े पर तरजीह देता हूँ
किसी और के पल-भर हँसने को
कमतर मानता हूँ तौल-तौल कर शब्द
ताने कसने को
या कहो उससे अच्छा मानता हूँ कमर कसना

विनोबा कहते थे दिल्ली में बसना
स्वर्गवासी हो जाने का पर्याय है
और पूछते थे
क्यों भवानी बाबू
इस पर तुम्हारी क्या राय है? 
 
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें। 
8 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Pandey

444 कविताएं

View Profile