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Hindi Kavita: बसंत त्रिपाठी की कविता 'काल का घुमड़ता बादल जब उन्मादी हवाओं के साथ बरस जाएगा'

काव्य डेस्क

Kavita
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काल का घुमड़ता बादल
जब उन्मादी हवाओं के साथ
बरस जाएगा
तब साफ़ और नीले आसमान के नीचे
मैं तुम्हारे लिए लाऊँगा कुछ महकते हुए फूल

टैंक और बमवर्षक विमान


जब ध्वस्त हो जाएँगे लड़ते-लड़ते
ठीक उसके बाद
मैं तुम्हें लिखूँगा पोस्टकार्ड
और ख़ूशबू से भरी हवा की पत्र-पेटी में डाल आऊँगा

हो सकता है कि मेरी क्षत-विक्षत आत्मा


भूल चुकी हो हत्या और चीख़ के अलावा तमाम शब्द
और उँगलियाँ काँपने लगे
जब वे तुम्हारा नाम लिखें
हो सकता है कि तुम्हारी ओर चलने की कोशिश में
धराशायी हो गिर पड़ूँ मुँह के बल
हो सकता है कि तुम्हारी देह
मुझसे भी ज़्यादा घायल और लस्त-पस्त हो
और दिल की नसों में बहता हो
धारदार ख़ंजर का पानी

हो सकता है कि मिलने के बाद


हम अजनबियों की तरह
एक दूसरे को निहारें अपनी झुर्रीदार बुझती हुई आँखों से

लेकिन मेरे प्रिय


तुम मेरी नज़र को
अपनी पलकों में छुपा लेना
और मेरी गूँगी ज़ुबान पर रख देना
दुनिया के तमाम ग़ैरदुनियावी शब्द

मैं अंधड़ से भरे तुम्हारे दिल में रख दूँगा


दुनिया में अभी ही जन्मी एक हरी कोमल पत्ती

युद्ध के बाद


घायल पसलियों, टूटी हड्डियों
और अपराजेय सपनों से
ऐसे ही बाहर आता है जीवन।

2 वर्ष पहले
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