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अज्ञेय: तुम हँसी हो - जो न मेरे होंठ पर दीखे

काव्य डेस्क

Kavita
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तुम हँसी हो - जो न मेरे होंठ पर दीखे,


मुझे हर मोड़ पर मिलती रही है।
धूप - मुझ पर जो न छाई हो,
किंतु जिसकी ओर
मेरे रुद्ध जीवन की कुटी की खिड़कियाँ खुलती रही हैं।

तुम दया हो जो मुझे विधि ने न दी हो,
किंतु मुझको दूसरों से बाँधती है
जो कि मेरी ही तरह इंसान हैं।
आँख जिनसे न भी मेरी मिले,
जिनको किंतु मेरी चेतना पहचानती है।
धैर्य हो तुम : जो नहीं प्रतिबिंब मेरे कर्म के धुँधले मुकुर में पा सका,

किंतु जो संघर्ष-रत मेरे प्रतिम का, मनुज का,
अनकहा पर एक धमनी में बहा संदेश मुझ तक ला सका,
व्यक्ति की इकली व्यथा के बीज को
जो लोक-मानस की सुविस्तृत भूमि में पनपा सका।
हँसी ओ उच्छल, दया ओ अनिमेष,
धैर्य ओ अच्युत, आप्त, अशेष। 
 
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2 महीने पहले
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