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Hindi Kavita: अज्ञेय की 2 चुनिंदा कविताएं

काव्य डेस्क

Kavita
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                                                  हाँ, दोस्त,
तुम ने पहाड़ की पगडंडी चुनी
और मैं ने सागर की लहर।

पहाड़ की पगडंडी :
सँकरी, पथरीली,
ढाँटी,पर स्पष्ट लक्ष्य की ओर जाती हुई :
मातबर और भरोसेदार
पगडंडी जो एक दिन निश्चय तुम्हें
पड़ाव पर पहुँचा देगी।
सागर की लहर
विशाल, चिकनी,
सपाट
पर बिछलती फिसलती हमेशा अज्ञात अदृश्य को टेरती हुई,
बेभरोस और आवारा...

लहर जो न कभी कहीं पहुँचेगी न पहुँचाएगी
न पहुँचने देगी, जो डुबोएगी नहीं तो वहीं
लौटा लाएगी
जहाँ से चले थे, सिवा इस के
कि वह वहीं तब तक नहीं रह गया होगा।

ठीक है, दोस्त
मैं ने लहर चुनी
तुम ने पगडंडी :
तुम
अपनी राह पर
सुख से तो हो?
जानते तो हो कि कहाँ हो?
मैं-मैं मानता हूँ कि इतना ही बहुत है कि अभी
जानता हूँ कि आशीर्वाद में हूँ-जियो, मेरे दोस्त,
जियो, जियो, जियो...
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मेज़ के आर-पार
आमने-सामने हम बैठे हैं
हमारी आँखों में
लिहाज है
हमारी बातों में
निहोरे
हमारे (अलग-अलग)
विचारों में
एक-दूसरे को कष्ट न पहुँचाने की
अकथित व्यग्रता।
अभी बैरा के आने पर सूची में
मैं खोजने लगूँगा कोई ऐसी चीज़ जो तुम्हें रुचती हो,
और तुम मँगाओगी कोई ऐसी जो तुम्हारे जाने
मुझे पसन्द है।
हमारे बीच
और मेज़ के ऊपर
सब कुछ ठीक है, ठीक-ठाक है;
नहीं है तो एक
मेज़ के नीचे
एक के पैर पर दूसरे का निर्मम दबाव
एक की हथेली में दूसरे की निर्दयी चिकोटी।
2 वर्ष पहले
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