पृथ्वी घूमती हुई गयी किस ओर
कि सेब में फूल आने लगे
छोटे-छोटे शहरों के चांद
अलग-अलग याद आए
बारिश से ऊपर उठते हुए उनका क़रार
घास की पत्तियों में ठहर गयी बूंदें
बिखरने लगीं तमाम नींद में
धूप उतरी नींबू में
पहला प्यार जब राख हो गया
ख़ुद को बचाया उस सांवली नृत्य शिक्षिका ने
दंगे के ख़िलाफ़ दिखी वह प्रभातफेरी में फिर
शरीर और समुदाय एक हुआ
लंबी छुट्टी बीच में ही ख़त्म कर
लौटी वह फिर काम पर
आयी अपनी छात्राओं के बीच
अभ्यास कराने सात सौ साल पुराने छंद का।