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आलोकधन्वा: तुम तो पढ़कर सुनाओगे नहीं कभी वह ख़त

काव्य डेस्क

Kavita
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तुम तो पढ़कर सुनाओगे नहीं


कभी वह ख़त
जिसे भागने से पहले
वह अपनी मेज़ पर रख गई
तुम तो छुपाओगे पूरे ज़माने से
उसका संवाद
चुराओगे उसका शीशा, उसका पारा,
उसका आबनूस
उसकी सात पालों वाली नाव
लेकिन कैसे चुराओगे
एक भागी हुई लड़की की उम्र
जो अभी काफ़ी बची हो सकती है
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में?

उसकी बची-खुची चीज़ों को
जला डालोगे?
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे?
जो गूँज रही है उसकी उपस्थिति से
बहुत अधिक
संतूर की तरह
केश में 
 
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