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रक्षा बंधन विशेष, मुनव्वर राना: भाई-बहन का रिश्ता क्या है...

काव्य डेस्क

Irshaad
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                                                  भाई-बहन

हमारे और उसके बीच इक धागे का रिश्ता है
हमें लेकिन हमेशा वो सगा भाई समझती है
 
उलझता रहता हूँ मैं यूँ तुम्हारी यादों से
कि जैसे बच्चे के हाथों में उन आ जाए
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झुक के मिलते हैं बुज़ुर्गों से

झुक के मिलते हैं बुज़ुर्गों से हमारे बच्चे
फूल पर बाग़ की मिट्टी का असर आता है
 
हर एक रिश्ते से अपने आपको आज़ाद कर लेंगे
ये बच्चे एक दिन कालोनियाँ आबाद कर लेंगे
 
नहीं सुनता है मेरी तो मेरे बच्चों की ही सुन ले
ये वो मौसम है जब चिड़िया भी अपना घर बनाती है

....आ पहुंची है लगता है क़यामत

दहलीज़ पे आ पहुंची है लगता है क़यामत
एक भाई को एक भाई से डर लगने लगा है
 
इसमें बच्चों की जली लाशों की तस्वीरें हैं
देखना हाथ से अख़बार न गिरने पाए

- मुनव्वर राना

(साभार - माँ , वाणी प्रकाशन से प्रकाशित मुनव्वर राना की ग़ज़लों की किताब से।)
8 वर्ष पहले
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