-क़तील शिफ़ाई-
यारो कहां तक और मोहब्बत निभाऊं मैं
दो मुझ को बद-दुआ कि उसे भूल जाऊं मैं
दिल तो जला किया है वो शोला सा आदमी
अब किस को छू के हाथ भी अपना जलाऊं मैं
सुनता हूं अब किसी से वफ़ा कर रहा है वो
ऐ ज़िंदगी ख़ुशी से कहीं मर न जाऊं मैं
इक शब भी वस्ल की न मिरा साथ दे सकी
अहद-ए-फ़िराक़ आ कि तुझे आज़माऊं मैं
बदनाम मेरे क़त्ल से तन्हा तू ही न हो
ला अपनी मोहर भी सर-ए-महज़र लगाऊं मैं
उतरा है बाम से कोई इल्हाम की तरह
जी चाहता है सारी ज़मीं को सजाऊं मैं
उस जैसा नाम रख के अगर आए मौत भी
हंस कर उसे 'क़तील' गले से लगाऊं मैं
(साभार- रेख़्ता)