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मोमिन ख़ां मोमिन: मुझपे तूफ़ां उठाये लोगों ने, मुफ़्त बैठे बिठाए लोगों ने

काव्य डेस्क

Irshaad
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                            -मोमिन ख़ां मोमिन-
        
                                                    
                            

मुझपे तूफ़ां उठाये लोगों ने
मुफ़्त बैठे बिठाए लोगों ने

कर दिए अपने आने-जाने के
तज़किरे[1] जाये-जाये[2] लोगों ने

वस्ल[3] की बात कब बन आयी थी
दिल से दफ़्तर बनाये[4] लोगों ने

बात अपनी वहां न जमने दी
अपने नक़्शे जमाए लोगों ने

सुनके उड़ती सी अपनी चाहत की
दोनों के होश उड़ाए लोगों ने

बिन कहे राज़हा-ए-पिन्हानी[5] 
उसे क्योंकर सुनाये लोगों ने

क्या तमाशा है जो न देखे थे
वो तमाशे दिखाए लोगों ने

कर दिया 'मोमिन' उस सनम को ख़फ़ा
क्या किया हाए-हाए लोगों ने
.
 
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9 वर्ष पहले
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