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गए साल की ठिठकी ठिठकी ठिठुरन...नए साल के नए सूर्य ने तोड़ी...

काव्य डेस्क

Irshaad
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                            गए साल की 
        
                                                    
                            
ठिठकी ठिठकी ठिठुरन
नए साल के
नए सूर्य ने तोड़ी।

देश-काल पर,
धूप-चढ़ गई,
हवा गरम हो फैली,
पौरुष के पेड़ों के पत्ते
चेतन चमके।

दर्पण-देही
दसों दिशाएँ
रंग-रूप की
दुनिया बिम्बित करतीं,
मानव-मन में
ज्योति-तरंगे उठतीं।

- केदारनाथ अग्रवाल 
8 वर्ष पहले
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