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हिंदी दिवस 2017 : केदारनाथ सिंह की कविता 'मातृभाषा'

काव्य डेस्क

Irshaad
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                            मातृभाषा 
        
                                                    
                            

जैसे चींटियाँ लौटती हैं
बिलों में
कठफोड़वा लौटता है
काठ के पास
वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक
लाल आसमान में डैने पसारे हुए
हवाई-अड्डे की ओर

ओ मेरी भाषा
मैं लौटता हूँ तुम में
जब चुप रहते-रहते
अकड़ जाती है मेरी जीभ
दुखने लगती है
मेरी आत्मा 

- केदारनाथ सिंह 
9 वर्ष पहले
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