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हुल्लड़ मुरादाबादी की हास्य रचना: नौजवान पागल

काव्य डेस्क

Hasya
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                                                  एक नौजवान पागल
जब पागलख़ाना से ठीक होकर आया
तो उसके मां-बाप ने
बहुत आनंद मनाया
नौजवान ने महसूस की 
तेजी के साथ बढ़ती हुई
ग़रीबी की बीमारी
महंगाई की चक्की में
पिसते हुए नर-नारा
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हर तरफ़ फ़रेब, बलात्कार औ हत्याएं
शर्मिंदा होती हुई कुरआन की आयतें
और वेदों की ऋचाएं
सिसकती हुई इंसानियत
बिलखता हुआ विश्वास
खून के आंसू रोता हुआ
देश का इतिहास।
उसने सोचा, क्या ज़माना है।

इससे अच्छा अपना पागलख़ाना है
यहां अपमान के अलावा
अपना कहने वाला कोई नहीं
भीगी-भीगी आंखें कई रातें सोई नहीं
उसकी छोटी बहन की हुई शादी
और दहेज के अभाव में 
पति ने ठीक रक्षा बंधन के दिन
उसकी चिता जला दी
उसे यह सदमा कचोट गया
और वह ख़ूनी कलाई लिए
फिर से पागलख़ाने लौट गया

(हुल्लड़ मुरादाबादी की यह 'नौजवान पागल' कविता 'यार सप्तक' नाम की किताब से ली गई है, यह किताब डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुई है।)
6 महीने पहले
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