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अशोक अंजुम की हास्य ग़ज़ल: ऊपर वाले बड़े मज़े से खींच रहे है माल मियाँ!

काव्य डेस्क

Hasya
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                            ऊपर वाले बड़े मज़े से खींच रहे है माल मियाँ!
        
                                                    
                            
लेकिन हमको नहीं मयस्सर हर दिन रोटी-दाल मियाँ!

कैसा जश्न कहाँ की खुशियाँ , वो ही रोज़ रोज़ खटना
जीवन के प्रश्नों से जूझे अपना हर इक साल मियाँ !

गुण्डों ने जो पीट दिया, थाने जाने की ज़िद मत कर,
अगर गया तो खिंच जाएगी, और भी तेरी खाल मियाँ!

अपनी आमदनी बढ़ती है- घिसट-घिसट कर आगे को,
लेकिन बड़ी तेज़ देखी है मँहगाई की चाल मियाँ!

सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग सारे बीत गये अब तो-,
घोटाला-युग दिखा रहा है अपने नित्य कमाल मियाँ!

राजनीति की खोल के गठरी जादूगर ने दिखलाये-
जाल के अन्दर जाल के अन्दर जाल के अन्दर जाल मियाँ!

खाली-पीली बने हुए हो यार यूनियन के लीडर,
मान जाएँगे जो करवा दो, मिल में तुम हड़ताल मियाँ!

होरी और धनिया की किस्मत लो अब बदली, तब बदली,
आज़ादी के बाद से नेता बज़ा रहे हैं गाल मियाँ!

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