साहित्य अकादमी पुरस्कार और व्यास सम्मान से नवाजी जा चुकी वयोवृद्ध लेखिका मृदुला गर्ग ने कहा है कि महिलाओं के प्रति समाज और खासकर पुरुषों का नजरिया आज भी बदला नहीं है। जब भी स्त्री अपनी स्वतंत्रता और अपने निजता से जुड़े सवालों को उठाती है, तो पुरुषों में खलबली मच जाती है और वे विरोध करने लगते हैं। भारतीय समाज आज भी उन्हीं रूढ़ियों का शिकार है जो सदियों से चली आ रही हैं। पुरुषवादी वर्चस्व आज भी बरकरार है और समाज के बदलने का लाख दावा किया जाए, लेकिन पुरुष आज भी स्त्रियों को नियंत्रित करना चाहते हैं, उन पर अधिकार जमाना चाहते हैं।
लगभग 93 साल बाद एक बार फिर से निकाली गई स्त्रियों पर केंद्रित पत्रिका ‘स्त्री दर्पण’ का लोकार्पण करते हुए मृदुला गर्ग ने भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति और पितृसत्ता का हवाला देते हुए सत्तर के दशक में अपने चर्चित उपन्यास चितकोबरा लिखे जाने पर अश्लीलता के आरोप में गिरफ्तारी का भी जिक्र किया और कहा कि आज भी भारतीय समाज मे स्थितियां बदली नहीं हैं।
75 वर्षीय लेखिका सुधा अरोड़ा ने इस मौके पर कहा कि स्त्रियों ने हमेशा सत्ता का विरोध किया है और आज भी हमें प्रतिरोध करने की जरूरत है। साहित्य में सत्ता के चाटुकार लोगों की जगह नहीं होनी चाहिए। उन्होंने राजेंद्र यादव की पत्रिका 'हंस' का जिक्र करते हुए कहा कि वह पत्रिका बीच में भटक गई थी और 'हंस' की जगह ‘हंसिनी’ हो गयी थी। उन्होंने उम्मीद जताई कि 'स्त्री दर्पण' नहीं भटकेगा और विरोध का तेवर बनाये रखेगा।
गौरतलब है कि 'स्त्री दर्पण' पत्रिका 1909 से लेकर 1929 तक यानी करीब 20 सालों तक इलाहाबाद से लगातार निकली और इस पत्रिका की संपादक थी रामेश्वरी नेहरू, जो मोतीलाल नेहरू के चचेरे भाई बृजलाल नेहरू की बहू थीं। जिस तरह आजादी की लड़ाई में गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’ महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘सरस्वती’ और महादेव प्रसाद सेठ के ‘मतवाला’ तथा प्रेमचंद की ‘हंस’ पत्रिका ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई कुछ वैसी ही भूमिका ‘स्त्री दर्पण’ ने भी निभाई थी लेकिन उसके अहम योगदान पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। अब 93 साल बाद यह पत्रिका फिर से निकाली गई है जिसका लोकार्पण मृदुला गर्ग ने ऑनलाइन किया। पत्रिका की संपादक हिंदी की वरिष्ठ कवयित्री एवम इग्नू में स्त्री अध्ययन की प्रोफेसर सविता सिंह और वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द कुमार हैं।
पत्रिका के सलाहकार मंडल में मृदुला गर्ग के अलावा वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा प्रसिद्ध आलोचक रोहिणी अग्रवाल और दिल्ली विश्विद्यालय में प्रोफेसर डॉक्टर सुधा सिंह शामिल है।
प्रोफेसर सुधा सिंह ने भी कहा कि इतिहास में स्त्रियों को उचित स्थान नहीं मिला और पितृसत्ता ने उनके नाम दर्ज नहीं किये जिससे वे ओझल हो गईं। उन्होंने स्त्री विमर्श में भाषा के सही इस्तेमाल पर जोर दिया और कहा कि कई बार स्त्री विमर्श करनेवाली स्त्रियों की भाषा और मानसिकता भी पुरुषवादी होती है। इसलिए हमें सचेत रहने की जरूरत है और स्त्रियों की सोच का समर्थन करने वाले पुरुषों को भी साथ लेकर चलने की जरूरत है।
संपादक सविता सिंह ने बताया कि करीब 2 साल पहले महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि के मौके पर फेसबुक ग्रुप का गठन हुआ था और देखते देखते डेढ़ वर्षो में इसके सदस्यों की संख्या 10,000 से अधिक हो गई और अब दुनिया के 54 देशों और भारत के सौ शहरों में ‘स्त्री दर्पण’ को देखा और पढ़ा जा रहा है।
कार्यक्रम का संचालन पारुल बंसल ने किया और धन्यवाद रीतादास राम ने दिया।
4 वर्ष पहले