टीमवर्क आर्ट्स और आईएलएफ समन्वय के सहयोग से आयोजित ‘रेत समाधि’ की शाम कई मायनों में ख़ास रही। गीतांजलि श्री की किताब को मिले बुकर प्राइज के जश्न कई दिग्गज साहित्यकार और लेखक शामिल हुए। लेखक गीतांजलि श्री ने बुकर के ‘आफ्टर इफेक्ट’ पर भी दिल से बात की। इस कार्यक्रम का आयोजन इंडिया हैबिटैट सेंटर के स्टेन ऑडिटोरियम में किया गया था।
शाम की शुरुआत करते हुए टीमवर्क आर्ट्स के मैनेजिंग डायरेक्टर और जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के प्रोडूसर संजॉय के. रॉय ने कहा, “जेएलएफ में हमने हमेशा अनुवाद की महत्ता पर जोर दिया है... ये आपको भौगोलिक और मानसिक सीमाओं के पार ले जाता है। बहुत सी अनजान राहों को जानने की आज़ादी देता है| ये पल भाषा के उत्सव का समय है।”
साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखिका और जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की सह-निदेशक नमिता गोखले ने कहा, “भारतीय भाषा को बुकर मिलना हम सभी के लिए गर्व का पल है। भारतीय भाषाओँ की ख़ूबसूरती उनकी विविधता और ताकत में है। भाषा उस पुल का काम करती हैं, जिनके माध्यम से हम एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। जेएलएफ अनुवाद के लिए काम करता रहा है... ‘रेत समाधि’ ऐसी किताब है, जो दोनों ही भाषाओं में खूब चर्चित रही।”
गीतांजलि श्री से बात करने की जिम्मेदारी लेखिका, अनुवादक पूनम सक्सेना ने बखूबी निभाई। सत्र की शुरुआत में ही उन्होंने गीतांजलि से पूछ लिया की ‘आफ्टर बुकर’ उनके जीवन में क्या बदलाव आये हैं और वो इस अप्रत्याशित शोहरत को कैसे संभाल रही हैं?
इस सवाल ने मानो ‘आइस ब्रेकिंग’ का काम किया और बड़ी ही बेबाकी से गीतांजलि ने उन सभी सवालों का जवाब दिया, जो बतौर एक पाठक और श्रोता हम सभी के मन में थे।
गीतांजलि ने बताया कि वो हमेशा से एकांत प्रिय रही हैं और बहुत बहिर्मुखी नहीं हो पातीं। इस नए बदलाव के साथ वो कुछ हद तक तो खुद को ढालने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन अपने मूल रूप को वो छोड़ना नहीं चाहतीं। उनके शब्दों में, “मैं कोई सेलिब्रिटी नहीं हूँ और न ही बन सकती हूँ, ये मेरे लिए बहुत समृद्ध अनुभव रहा पर अभी भी मैं अपने एकांत में ही खुद को पाना चाहती हूँ।”
एक मुश्किल लेखिका होने के सवाल पर उन्होंने कहा, “साहित्य को समझने के लिए रुकना पड़े, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। साहित्य का काम आपको समझाना नहीं है, ये आपको अचंभित करने के लिए है,आपके अनुभव को समृद्ध बनाने के लिए है।”
फिर उन्होंने अशोक वाजपेयी के शब्दों को उद्धृत करते हुए कहा, “साहित्य समोसा नहीं है कि मुंह में रखते ही स्वाद आ जाए। समोसा साहित्य की कामना रखने वाले पाठक ऐसे लेखकों के पास जा सकते हैं, जहाँ इंस्टेंट कंटेंट तैयार मिलता है।”
4 वर्ष पहले