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अमर उजाला शब्द सम्मान: हम नवोदित भी आए हैं जी...

काव्य डेस्क

Halchal
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अमर उजाला शब्द सम्मान के लिए आई रचनाओं में साहित्य की उस दुनिया की झलक हमें मिली है, जिसे अक्सर हम देख नहीं पाते। नामी-गिरामी साहित्यिक नामों से अलग, ये दुनिया उन नामों से बनी है, जो उत्साह से भरे हैं, जिंदगी के लिए उनके पास प्यार है और दिल में शब्दों के लिए सम्मान है।

उनकी चिट्ठियों में माटी की गंध है। अपनी रचनाओं में उन्हें जिंदगी नशे की तरह प्यारी है। अमर उजाला फाउंडेशन की तरफ से शब्द सम्मान की घोषणा के बाद उनके उत्साह को जैसे पंख लग गए। डाक आज भी लगातार आ रही है। नियमावली और शर्तें अपनी जगह। उनका भरोसा और सम्मान के लिए प्यार अपनी जगह। बड़े-बड़े साहित्यिक नामों और उनके लिए प्रस्तावित प्रपत्रों से अलग उन्होंने जो भी लिखा, उसे शब्द सम्मान के अनुरूप समझा और हमें भेजा। संख्या कई सौ हैं। उनमें से कोई भी पेशेवर लेखक नहीं। कोई कांस्टेबल है, कोई वकील है, कोई छात्र, कोई शिक्षक, कोई पंडित, कोई ठेकेदार तो कोई गृहणी। कई तो मीलों की यात्रा करके खुद पहुंचे।

चंडीगढ़ से आए थे कांस्टेबल जितेंद्र सिंह, कहा-"शब्द सम्मान स्पर्धा में हम नवोदित भी आए हैं जी!" जितेंद्र सिंह लय में कविता लिखते हैं। विभाग में कवि के रूप में जाने-जाते हैं, पुरस्कृत भी हैं। उन्होंने हरियाणा की शान में और लोगों को ट्रैफिक के नियमों से जोड़ने के लिए जो लिखा, वह शब्द सम्मान के लिए दे गए। रायबरेली के देव कृष्ण गुप्ता ने अन्ना हजारे के आंदोलन पर लिख कर भेजा। देव सिंह यादव ने अपना 'फाग हितोपदेश' भेजा। पीलीभीत जिले के नौगवां पकड़िया गांव से रूप लाल प्रजापति ने मां पर कविता लिखकर भेजी है। शुक्लागंज के ब्रह्म नगर से ओमजी त्रिवेदी ने 'बेटी' कविता भेजी है। ओमजी नौंवी कक्षा में पढ़ते हैं।
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सैकड़ों की संख्या में...

सैकड़ों की संख्या में आई ये रचनाएं अनगढ़ लग सकती हैं, लेकिन इन्हें पढ़ने के बाद इतना तो जरूर लगता है कि अभी भी साहित्य मनुष्य की उम्मीद का एक भरोसेमंद घर है। रचनाएं भेजने वाले ये वे लोग हैं, जो छोटी जगहों पर रहते हैं। हाल के दिनों में बड़ी जगहों में इमारतों की शक्लें और सड़कों के रुख और शहरों के मूड जरूर बदल गए हों, लेकिन ये उन जगहों से हैं जहां एक गली में लोग पीढ़ियों से रहते आए हैं, इसलिए इनके अनगढ़ साहित्य की अदालत में अभियोग की इजाजत नहीं मिलती, यहां आत्माभियोग का ही अवसर होता है।
फतेहपुर जिले के मोहनपुर गांव से सुफल सिंह लिखते हैं,"हवा कह रही है...खुशबू लेकर आई हूं।"

ये खुशबू माटी की है, फूलों की है और परिवेश की है। बस्ती से मयंक प्रजापति ने अपनी कविता में जंगल को बचाने की बात की है। मयंक पेशे से वकील हैं। सहारनपुर के कलारिया रोड में रहने वाले सैय्यद तसनीम के शब्दों में दर्द है-"सताने लगे हैं लोग।"  हाथरस से नौरंगी लाल ने 'दूध की तबाही' लिखा है। अक्सर, आलोचना के खेमे में यह बात कही और सुनी जाती है कि हमारी उम्मीद का स्थापत्य इतना बदल गया कि उसमें साहित्य के लिए जगह न बची। लेकिन इन रचनाओं को देखकर राय तो बदलती है।

आज हम सब...

आज हम सब एक-तरह की संस्कृति जी रहे हैं। सबके पास एक ब्रैंड के कपड़े, एक सा खाना, एक तरह की खबरें, एक तरह की कारें, एक सी बहसें। ऐसे में इन नए और उत्साही लेखकों की रचनाओं में साहित्य का असली प्रजातंत्र दिखता है। सम्मान के लिए कई तरह की प्रक्रियाएं होती हैं। कुछ मापदंड होते हैं। लेकिन उत्साह का मापदंड कुछ अलग ही होता है। खुद की मौजूदगी का अहसास करना भी उत्साह का ही एक काम है। लिखने का व्याकरण भावनाओं के ज्वार को  कभी नहीं रोक सकता, शब्द सम्मान में भेजे गए इन रचनाकारों के प्यार ने यह साबित कर दिया है। पुरस्कार के रास्तों पर ये रचनाएं कहां तक जाएंगी, ये अलग बात है। पीलीभीत के फीलखाना में रहने वाली विनिता वाला मिश्रा तो रास्ते से ही पूछ रही हैं-" रास्तों, जरा बता दो, कहां तक जाओगे !"
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