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'अटक गई नींद': प्रेम की अनोखी व्याख्या

रत्नेश मिश्र

Book Review
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                                                  'चलते रहे रात भर', 'ज़िन्दगी एक कण है' के बाद 'अटक गई नींद' काव्य-संग्रह को पढ़ना और फिर उस पर बिना लिखे रह जाना, संभव नहीं है। संग्रह में कुछ 134 कविताएं हैं जिनमें से लगभग 50 कविताएं छोटी हैं। कुछ कविताएं पिछले संग्रहों से रिपीट हुई हैं। इस संग्रह पर कुछ लिखूं उससे पहले एक कहानी सुनाती हूँ। 

'बात उन दिनों की है जिन दिनों हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर बंगला के अप्रतिम कथाकार शरत चंद्र की जीवनी 'आवारा मसीहा' लिख रहे थे। उन्हीं दिनों शरतचंद से मिलने के लिए जब वह बंगाल पहुँचे तो पता चला कि, आजकल शरतचंद किसी वेश्यालय में रह रहे हैं। अपने प्रिय रचनाकार की इस घटना ने विष्णु जी को अचंभित किया। वह जानते थे शरत चंद महान और लोकप्रिय साहित्यकार हैं के साथ सम्मानित व्यक्ति भी हैं। खैर, वह जब शरत जी से मिले तो कारण पूछे। 

शरत जी ने बताया- 'आजकल 'चरित्रहीन' लिख रहा हूँ। जो वेश्याओं के जीवन से जुड़ा है। साहित्यकार को कभी भी अपने अनुभव से बाहर लेखन नहीं करना चाहिए।'

 इस घटना का ज़िक्र मैंने अनायास नहीं किया। कोरा मनोरंजन या रोमांचकता साहित्य का उद्देश्य हो ही नहीं सकता। जब तक अनुभव नहीं होगा साहित्य जीवन के आस-पास हो ही नहीं सकता। दावा तो नहीं लेकिन विश्वास से कह सकती हूँ कि राकेश मिश्र की कविताओं में गुथी भावनाएं जीवन के उन व्याकुल पलों का गान हैं जिसकी धुन से हर कोई अपना जीवन राग मिला सकता है। कविता जीवन का यथार्थ केवल व्यक्त ही नहीं करती बल्कि उस यथार्थ को आने वाले समय के गर्भ में डाल कर आने वाले समय से जूझने के लिए खड़ा भी कर सकती है।
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'अटक गई नींद' की कविताएं अन्य संग्रहों की भाँति कई विषयों को समेटे हुए हैं लेकिन 'प्रेम' इस संग्रह की मूल भावना है। एक तरह से कहें तो यह संग्रह प्रेम की बहुआयामी व्याख्या है। मैं अपनी बात उनकी प्रेम कविताओं पर ही केंद्रित करती हूँ। राकेश मिश्र के यहाँ प्रेम की कोई शर्त नहीं है। वह घनानन्द की भाँति स्वच्छन्द है, लेकिन उस  छंदता में जो अनुराग का बंधन है वह अनोखा है। 

उसमें जो समर्पण और एकनिष्ठता वह प्रेम का चरमोत्कर्ष है। प्रेम की अक्सर परिणति वियोग ही है लेकिन वियोग ही जब प्रेम का अनंदवास बन जाए तब ये पंक्तियां सृजित होती हैं-

'जीना है
उसके लिए
जिससे जिंदगी अच्छी लगती है
उसके लिए भी
जिस बिन
ज़िन्दगी नहीं है।'


प्रेम की संभावना हर उस जगह होती है, जहाँ समर्पण होता है। प्रेम के उन क्षण को कौन नहीं जीना चाहता है। समय न हो तो प्रेम किया जा सकता है। उसे महसूसा जा सकता है, लेकिन ज़िन्दगी ही न हो तो क्या किया जाए। ऐसी ही पीड़ाओं को आत्मसात कर जीने वाले प्रेमियों के लिए इससे अच्छी कविता क्या हो सकती है-

'बहुत चाहता हूँ
मैं
तुमको 
पर 
देखो-
जब मैं बहुत चाहता हूँ
तुमको
तब ज़िन्दगी
ज़िन्दगी नहीं रहती।'

प्रेम की सत्ता स्वतंत्र है। उसकी न कोई शाखा नहीं है। न परिभाषा है न कोई व्याख्या, सिर्फ सन्दर्भ और प्रसंग होते हैं। अपने अनुभव चाहे आप जैसी व्याख्या कर लीजिए। राकेश मिश्र भी प्रेम की एक परिभाषा नहीं देते-

'प्रेम' कविता में वह लिखते हैं-

प्रेम चरमोत्कर्ष है
असमस्त बिंदुओं के बीच
प्रेम
एक अनवरत मौन है
समस्त वासना संवादों के बीच
प्रेम
आत्यन्तिक विद्रोह है
रोम रोम का समस्त जड़ता के बीच
प्रेम 
एक विश्वास है सब कुछ पास होने का
समस्त अकिंचनता के बीच


एक कवि के तीन काव्य-संग्रहों पर लिखना उतना ही जटिल है जैसे एक प्रश्न-पत्र में एक ही प्रश्न को तीन बार हल करना। राकेश मिश्र की कविताएं पढ़ते-पढ़ते पाठक को बार-बार उन क्षणों में ले जाती हैं, जहाँ से उसका कुछ अधूरा छूट गया था। अतीत के कमरे में लौटकर उसमें वर्षों पहले जो छूट गया है उसकी स्मृति तलाश ही प्रेम है-

'तुम्हारा प्रेम
उस सिक्कों की तरह है
जिन्हें भरकर नन्हीं मुट्ठियों में
मेरा बचपन और मैं
घर के बग़ल में ही
काजी हाउस के अंधेरे कमरे में।'

कवि जहाँ अपनी बात को बहुत सहजता से कहने में असमर्थ होता है वहाँ अपनी कल्पना से एक दुनिया  बनाता है, जहाँ पीड़ा भी फ़ैंटेसी हो, लेकिन उस पीड़ा में तिलमिलाहट न हो। अगर कुछ है भी तो उसे कम करने के लिए वह प्रकृति को चुनता है। हिंदी कविता की यह बहुत प्राचीन लेकिन कारगर टेक्निक है कि कवि अपनी मनभावना को भिव्यक्त करने के लिए प्रकृति का आश्रय लेता है। राकेश मिश्र उसी भावभूमि पर आकर ठहरते हैं-

'सागर की लहरों से बुनी
शैया मेरी
तारों की तपन से
ऊष्मित हैं
सपने मेरे।'


प्रेम की जितनी सुन्दर और अनुकरणीय छवियां हो सकती हैं वह सभी मिश्र जी के पास सुरक्षित हैं। जब वह प्रेम को अभिव्यक्त करते हैं तो ऐसा लगता है। उनकी चेतना में ठहरी अवचेतन शक्ति झुंझला कर उठ बैठी हो। अपनी प्रेमिका की हँसी की एक तस्वीर में फ्रेम करके अपनी स्मृति की दीवारों पर हमेशा के लिए टांग लेना और जब-तब उसे याद करते रहन प्रेम का नया माध्यम है-

'एक तस्वीर है
उसकी हँसी
खिंचती रहती है
अनंत आवृत्तियों में
मुझमें।'


पूरा हिंदी साहित्य उठाकर देख लीजिए आँखें न हों तो प्रेम कैसे संभव हो सकता है। नैनों के प्रतीक, प्रतिमान विश्व साहित्य में भरे हुए हैं। राकेश मिश्र कैसे बच सकते हैं। लेकिन उनकी कविताओं की एक विशेषता यह भी है कि वह प्रतीकों की नई दुनिया रचते हैं।

नैन मीन के आकार के सुन्दर हो सकते हैं, समंदर की तरह अथाह गहराई वाले हो सकते हैं, मयखाना हो सकते हैं लेकिन नहीं यहाँ मैदानी नदी हैं जो बादलों को देखते ही हाहाकार उठती हैं। यह मैदानी नदी और यह हाहाकार हिंदी साहित्य में संभवत: पहली बार दर्ज हुए हैं। कवि को यह बताना भी नहीं है, उसे बताना है कि इस हाहाकार में उस मैदानी नदी के तटों पर एक मौन कलरव खेलता है। कलरव जब मौन हो जाए तो उसके अंदर क्या-क्या टूटता होगा इसकी कल्पना करना भी असंभव है-

'एक मैदानी नदी हैं
उसकी आंखें
हाहाकार कर उठती हैं
बादलों को देखकर
अन्यथा
मौन कलरव हैं
रेतीले तटों पर।'

कवि के पास जो प्रतीक, बिम्ब और उपमान हैं वह स्मृति में ठहरे हुए प्रेम को प्रवाह में बदल देते हैं, ऐसे प्रवाह में जिसमें बहकर किसी किनारे लगना बहुत कठिन है। स्मृति में प्रेम की सुन्दर छवियां हों तो जीवन कठिन से कठिन समय में सरल लगने लगता है। कवि के पास स्मृतियों का सुखद संसार है।  आइए उस संसार से आप भी मिलिए-

'एक सरल हस्ताक्षर है
तुम्हारी याद
मेरी साँसों पर 
ताम्बई स्याही में लिपटी 
नक़ल करके जिसकी
सांसों के हाशिए पर 
अक्सर 
मैं तुम्हें छू लेता हूँ।'


राकेश मिश्र विज्ञान के विद्यार्थी हैं। गणित भी उन्हें आती है। हिंदी का आशीर्वाद उन्हें मिल चुका है। लिहाज़ा कई स्थानों पर वह हिंदी की संवेदना और विज्ञान के प्रायोगिक ज्ञान को एक जगह मिलाकर संवेदना का रोमांच रचते हैं। अधिकतर कविताएं प्रेम के वियोग पक्ष की है लेकिन उसे वह संयोग की मध्यरेखा मानते हैं जहाँ से प्रेम की शुरुआत होती है। रिक्तता में बीच में अपने अंदर प्रेम भर लेने की कला राकेश मिश्र की विशेषता है-

'दो प्रतीक हैं
हम-तुम
खिंचे दीवालों पर आँधियों के
उड़ जाने को
दो रुपहले सूत हैं
तने विकर्णो पर 
साधते दिशा-पृष्ठ
हम-तुम
दो बूँद पारदर्शी तरलता हैं
चले आसमानों से
थामते रक्त ताप।' 


इस काव्य संग्रह को मैं प्रेम कविताओं पर लिखे गए महत्वपूर्ण काव्य-संग्रहों की थाती मानती हूँ। यह अनायास नहीं बल्कि इसमें शामिल कविताओं का बारीकी से अध्ययन करने के बाद एक समीक्षक की दृष्टि से कह रही हूँ। एक कविता है, पहले आप उसे पढ़ें-

'प्रेम
बरसाती पानी की तरह
बह जाएगा
उड़ जाएगा
अनजाने
अनचाहे गंतव्यों की ओर
प्रेम संजोने
जमा करने 
दान देने की वस्तु नहीं
प्रेम को जीना होता है
अभी
इसी क्षण।"

 

मैं समझती हूँ। प्रेम की इससे बेहतर परिभाषा नहीं हो सकती। यहाँ जिस प्रेम की बात की गई है वह सारभौमिक है। कोई भी प्रेम तभी तक प्रेम है जब तक उसका अनुभव साथ है। अनुभव चाहे सुखद हो या दुखद। किसी न किसी रूप में महसूसा गया भाव ही तो प्रेम है। राकेश 'प्रेम मार्ग के धीर-गंभीर पथिक हैं' उनकी कविताओं में प्रेम तत्क्षण भोगे गए एहसासों का नाम है। यह जो महसूसना है वह ख़त्म नहीं होना चाहिए बेशक मिलना न हो। प्रेम का आध्यात्मिक स्वररूप कहता भी है। 

आत्मा से आत्मा की संधि ही प्रेम ही शरीर तो मिथ्या है। यह कविता देखें- 
'पत्ते
रिश्ते में है
हवा से कोई बंधन नहीं
मैं तुम्हें याद आता रहूँ
मिलना जरुरी नहीं है।'


इस प्रकार हम कहते हैं कि राकेश मिश्र की 'अटक गई नींद' संग्रह की कविताएं जहाँ प्रेम में सिमटती हैं वहां आँखों, बातों, मुस्कान, हँसी में प्रवेश कर खुश हो जाती हैं और जहाँ विस्तार पाती हैं वहाँ अपने वजूद को किसी वजूद में समेट कर खुद को पीड़ा में डाल लेती हैं, अपनी अस्मिता को उसकी अस्मिता से जोड़ देती हैं। राकेश जी को बहुत बधाई। अगले संग्रह की प्रतीक्षा रहेगी।

(लेखिका हंसराज कॉलेज, दिल्ली की  प्राचार्या हैं) 
9891172389

 
7 वर्ष पहले
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