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नीलम सक्सेना चंद्रा : आज बादल बन बरस जाना है

काव्य डेस्क

Book Review
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                            नीलम सक्सेना चंद्रा 90 के बाद के साहित्यिक परिदृश्य में एक जाना पहचाना नाम हैं। कविताएँ, कहानियां, उपन्यास और बाल साहित्य जैसी अनेक साहित्यिक विधाओं में नीलम अपनी लेखकीय विशिष्टता का परिचय दे चुकी हैं। प्रेम, स्त्री, प्रकृति समेत सामाजिक समरसता से जुड़े तमाम मुद्दे इनकी रचनाओं में प्रमुखता से जगह पाते रहे हैं। 
        
                                                    
                            

"आज बादल बन बरस जाना है" नीलम चंद्रा की 50 कविताओं का संग्रह है। यह कविताएं बादलों की तरह मन में जोश, जुनून और जुस्तजू भर देती हैं। इस संग्रह में कई मिज़ाज की कविताएं हैं लेकिन प्रेम और स्त्री प्रश्नों को स्वर देती कविताएँ इस संग्रह के केंद्र में हैं। काव्य लेखन में नीलम के उत्कृष्ट संवेदनशील व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं। वे लिखती हैं, 

"मैं कविता हूँ! 
तन्हाई में 
प्रेम के एहसास जगाती हूँ; 
बेबसी में 
उम्मीद के दिये जलाती हूँ" 

दरअसल कविता में प्रेम का एहसास जगाने और उम्मीद के दिये जलाने की ताक़त कवि के नज़रिये की ही ताक़त है। कवि का सामाजिक बोध और उसकी पक्षधरता ही उसका साहित्यिक योगदान निर्धारित करते हैं। नीलम अपनी कविताओं में ज़िंदगी की ख़ूबसूरती को सहेजते हुए प्रेम और समर्पण का मूल्य स्थापित करती हैं। 'वो बेल' शीर्षक कविता में वे कहती हैं, 

"वो खुबसूरत सी बेल, 
जी भरकर कोशिश करती 
लिपट जाने की 
उस कांटेदार बबूल से, 
शायद बहुत मोहब्ब्त करती थी वो उससे! 

अपने ड्राइंग रूम की खिड़की से,
मैं अक्सर देखा करती थी 
बबूल को उसे चीरते हुए; 
न जाने कितनी हिम्मत थी उस बेल में 
कि वो एक बार फिर कोशिश करती 
उसके पास आने की!" 

बेल का बार-बार बबूल के पास आना बेल के प्रेम और समर्पण का सबूत है, जिसमें प्रेम का भाव होगा उसका व्यवहार सौम्य ही होगा। यहां कवयित्री ने दो ऐसे प्रतीक चुने हैं जो अपने स्वभाव से प्रेम और निष्ठुरता का भाव स्पष्ट कर देते हैं। पहली नज़र में बेल प्रेमिका जैसी दिखाई देती है लेकिन बेल और बबूल का अंतर प्रेम भाव का अंतर है न कि लैंगिक अंतर। प्रेम का भाव ही इंसान को स्वार्थ की भावना से ऊपर उठाता है, उसके जीवन में उत्साह और उमंग फैलाता है। प्रेम के भावों में पगा हुआ इंसान ही कह सकता है कि, 

"ख़ामोश दरख़्तों को भिगोना है, 
इठलाती साखों से टकराना है, 
गुलाबी फूलों के लबों को गीला कर 
हरी पत्तियों संग मुस्कुराना है, 
आज बादल बन बरस जाना है...।" 

कवयित्री नीलम प्रेम के भावों को प्रायः प्रकृति के ज़रिये से बयां करती हैं क्योंकि प्रकृति अपने भावों को बिना किसी पूर्वाग्रह के पूरी तरह व्यक्त करती है। प्रकृति में बनावट नहीं है, वो हमेशा अपने मौलिक स्वरूप में सामने आती है। कवयित्री का प्रेम भी बिना किसी पर्दे के महबूब के सामने इज़हार होता है। प्रेम के अलावा स्त्री संवेदना और स्त्री जीवन से संबंधित विषय भी नीलम की कविताओं में केंद्रीय रूप में दिखते हैं। एक स्त्री का जीवन संघर्ष पुरुष की तुलना में बहुस्तरीय होता है। स्त्री एक ओर जहां अपने घर-परिवार और समाज के हिस्से की लड़ाई लड़ती है, वहीं दूसरी ओर इन सबके ख़िलाफ़ अपने अस्तित्व की लड़ाई भी लड़ती है। स्त्री कदम-कदम पर रूढ़ सामाजिक मूल्यों द्वारा सवाल कर हतोत्साहित की जाती है। 'निश्चय' शीर्षक कविता में कवयित्री लिखती हैं, 

जब वो चलने की कोशिश कर रही थी, 
किसी ने कहा, 
"बहुत शूल हैं राहों में, 
पाँव खून से लथपथ हो जायेंगे!" 

...किसी ने कहा, 
"आगे पहाड़ हैं, दर्द होगा, 
पाँव में छाले आ जायेंगे।" 

और जब इस पर भी स्त्री के पैर नहीं रुके तो उसके साथ अच्छा बनने का खेल खेला गया और ख़ास बात यह कि ये खेल कोई नया नहीं बल्कि 

"सदियों से, 
औरत को सिखाया गया है, 
अच्छा बनना 
समाज की नजरों में! 
कि कहीं किसी का दिल न दुखे..." 

लेकिन कवयित्री का स्त्रियों के लिए यह स्पष्ट संबोधन है, 

"सुनो, 
बंद करना होगा यह खेल, 
अच्छा बनने का, 
समाज की नज़रों में! 
अब अच्छा बनकर देखो 
ख़ुद की नजरों में!" 

क्योंकि यह समाज हमेशा ही स्त्री को अपनी शर्तों पर रखता आया है फिर भी एक स्त्री को यह इंसान जैसा भी सम्मान नहीं दे पाया। 

"कभी उसे पढ़ने से रोका जाता है 
कभी परंपरा के नाम पर, 
चार दीवारियों में क़ैद किया जाता है, 
कभी उसे घूँघट में ढक दिया जाता है; 
कभी औलाद न पैदा कर पाने पर 
बाँझ कहा जाता है..." 

समय भले ही बदल गया हो लेकिन हमारा नज़रिया आज भी नहीं बदला है। 'आज बादल बन बरस जाना है' की कविताएं हमारे रूढ़ नज़रिये पर भी सवाल खड़े करती है।

नीलम सक्सेना चंद्रा एक इंजीनियर हैं और यू.पी.एस.सी में संयुक्त सचिव के पद पर कार्यरत हैं और कविताएँ, कहानियाँ लिखना उनका शौक़ है। नीलम चंद्रा की 800 से ज़्यादा रचनाएं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके चार उपन्यास, एक उपन्यासिका, पांच कहानी संग्रह, 25 काव्य संग्रह और 10 बच्चों की किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। नीलम चंद्रा को कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया। अमेरिकन एम्बेसी द्वारा आयोजित काव्य प्रतियोगिता में गुलज़ार द्वारा पुरस्कार, रबिन्द्रनाथ टैगोर अंतरराष्ट्रीय काव्य पुरस्कार 2014, रेल मंत्रालय द्वारा प्रेमचंद पुरस्कार, चिल्ड्रेन ट्रस्ट द्वारा पुरस्कार, पोएट्री सोसाइटी ऑफ़ इंडिया द्वारा आयोजित काव्य प्रतियोगिता 2017 में द्वितीय पुरस्कार, भारत पुरस्कार। इनके गीत 'मेरे साजन सुन सुन' को रेडियो सिटी द्वारा फ्रीडम पुरस्कार मिला। आपके कार्य को सराहते हुए एक साल में सबसे ज़्यादा पुस्तकें प्रकाशित करने के लिए लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड द्वारा इन्हें मान्यता मिली है। नीलम चंद्रा को फ़ोर्ब्स मैगज़ीन ने 2014 में देश के 78 प्रख्यात लेखकों में नामित किया।
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