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इलिबरल इंडिया: गौरी लंकेश एंड द एज ऑफ अनरीजन

काव्य डेस्क

Book Review
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गौरी की हत्या से क्षुब्ध लेखक का यह निष्कर्ष बहुत स्वाभाविक है कि सिर्फ कर्नाटक में नहीं, भारत और अमेरिका में भी उदारवाद की जगह तेजी से सिकुड़ रही है।

निडर पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पनसारे और एम. एम. कलबुर्गी की हत्याओं की कड़ी में ही एक और हत्या थी, जिसकी पटकथा पहले ही बुनी जा चुकी थी, पर गौरी की हत्या ने लोगों को ज्यादा क्षुब्ध किया। दरअसल गौरी उन तर्कवादियों की तुलना में युवा थीं और कर्नाटक की होने के बावजूद मुख्यधारा के मीडिया में काम कर चुकीं पत्रकार थीं। टाइम्स ऑफ इंडिया के विदेश संपादक चिदानंद राजघट्टा की यह किताब गौरी लंकेश की भावुक स्मृति भर नहीं है, गौरी उनकी पत्नी थीं और बाद में हालांकि उनका तलाक हो गया था, पर आपसी रिश्ते पहले जैसे ही सौहार्दपूर्ण थे। यह पुस्तक गौरी के बहाने असहिष्णु होते समाज की पड़ताल करती है।

इस किताब में लेखक ने कर्नाटक की संस्कृति और नए परिदृश्य में सनातन हिंदू धर्म का विरोध करने वाली लिंगायत सोच पर बढ़ते खतरे को रेखांकित किया है। कर्नाटक में वैष्णव परंपरा के साथ ही शैव परंपरा फली-फूली। बसवन्ना के नेतृत्व में 12 वीं शताब्दी में अस्तित्व में आई लिंगायत परंपरा शैव आधारित एक सुधारवादी भक्ति आंदोलन थी, जिसमें मूर्ति पूजा, जाति प्रथा और लिंगभेद को अस्वीकार किया गया। लिंगायतों ने सनातन हिंदू धर्म पर आधारित वीरशैव समुदाय से विद्रोह किया। कलबुर्गी और गौरी, दोनों लिंगायतों की इस पृथक पहचान के बारे में मुखर थे। कलबुर्गी ने तो लिंगायत वचनकारों पर व्यापक काम किया था और वह लिंगायतों द्वारा गणेश चतुर्थी जैसे उत्सव मनाए जाने पर सवाल कर रहे थे। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव से पहले लिंगायतों की अलग पहचान की आवाजों को खामोश करने की साजिश चली, जिसके राजनीतिक निहितार्थ थे। यह भी एक अजीब संयोग है कि कलबुर्गी और गौरी की हत्या उसी बरेटा गन से हुई, जिससे दशकों पहले नाथूराम गोड्से ने गांधी को निशाना बनाया गया था।
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चिदानंद ने कर्नाटक में आए बदलाव की हवा के बारे में विस्तार से लिखा है।

चिदानंद ने कर्नाटक में आए बदलाव की हवा के बारे में विस्तार से लिखा है। वह और गौरी बंगलुरु के उस सेंट्रल कॉलेज में पढ़े थे, जिसने सी. वी. रमन, राजाजी, सर एम विश्वेश्वरैया और    सी. एन. आर. राव जैसे चार भारत रत्न दिए थे। बंगलुरु साउथ लोकसभा सीट पर हमेशा विपक्षी पार्टी जीतती आई है, जो यहां की अलग सोच का सुबूत है। खुद गौरी के पिता और दादा जी स्वच्छंद विचारों के समर्थक थे। चिदानंद और गौरी को कॉलेज में डॉ. एच नरसिम्हा जैसे प्रोफेसर मिले, जिन्होंने बंगलुरु यूनिवर्सिटी के वीसी के तौर पर पुट्टपर्थी के साईं बाबा के चमत्कारों को चुनौती दी थी। नरसिम्हा के प्रेरणा पुरुष श्रीलंका के तर्कवादी डॉ. अब्राहम कोवुर थे, जिनको आधार बनाकर वर्षों बाद आमिर खान ने 'पीके' जैसी फिल्म बनाई। गौरी को जवानी में गिरीश कर्नाड और अनंतमूर्ति जैसे उदारवादियों का भी मार्गदर्शन मिला था।

पर उसी स्वच्छंदतावादी कर्नाटक में अब बाबा बुदन गिरी, टीपू जयंती और लव जेहाद जैसे विभाजनकारी मुद्दे हावी हैं। गौरी की लड़ाई सिर्फ कट्टरवाद से नहीं, सत्ता के दमनकारी चरित्र से थी और बाहरी दुनिया के साथ अपने घर-परिवार से भी थी। अपने सहपाठी और नक्सलवादी बन गए साकेत रंजन की पुलिस मुठभेड़ में मौत को जब गौरी ने 'लंकेश पत्रिके' में मुद्दा बनाया, तो भाई इंद्रजित ने उन्हें अखबार से अलग होने के लिए कहा। तब गौरी को भी नक्सलवादी बताने की सुनियोजित कोशिश हुई। नतीजतन गौरी ने 'गौरी लंकेश पत्रिके' नाम से अपना अखबार शुरू किया। जो राज्य दलितों पर अत्याचार के लिए कुख्यात है, वहां गौरी ने अपने अखबार में दलित आवाजों को पर्याप्त जगह देकर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाई।


किताब- इलिबरल इंडिया : गौरी लंकेश एंड द एज  ऑफ अनरीजन
लेखक- चिदानंद राजघट्टा
प्रकाशक- वेस्टलैंड बुक्स, चेन्नई
मूल्य- 499 रुपये
7 वर्ष पहले
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