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मैकॉले को ख़लनायक माना जाए या महानायक?

काव्य डेस्क

Book Review
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                                                  एकेडमिक डिस्कोर्स में अक्सर एक सवाल खड़ा होता है कि मैकॉले को ख़लनायक माना जाए या महानायक? वे एक साधारण लेखक थे या महज़ एक अंग्रेज़ अफ़सर? मैकॉले भारत के इतिहास का एक मुख्य और विवादास्पद हिस्सा बने रहे हैं। बुद्धिजीवि वर्ग के एक तबके में ऐसी धारणा है कि भारत को आज़ाद हुए 70 साल बीत गए और इस दौरान हमारी शिक्षा व्यवस्था में कोई मौलिकता नहीं उभर पाई है। यह धारणा मज़बूत हुई है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली मैकॉले, वुड, सार्जेण्ट, बेंटिक व ऐलफिन्सटन के विचारों तले चरमरा रही है। ये सवाल भी उठे हैं कि आख़िर इन लोगों ने ऐसे कौन से क़दम उठाए जिनसे भारत में शिक्षण, ज्ञान-निर्माण और अन्य सभी बौद्धिक कार्य कुंद पड़ गए?  मैकॉले को किस नज़रिए से देखा जाए यह कहना सचमुच बहुत कठिन है। 

यदि आप आज तक इस दुविधा में नहीं थे तो वाणी प्रकाशन की नई किताब 'मैकॉले, एलफिन्सटन और भारतीय शिक्षा' के लेखों को पढ़कर इन अलग-अलग नज़रियों के बारे में सोचना ज़रूर शुरू कर देंगे।

मैकॉले को शिक्षा जगत के लगभग हर सेमिनार और चर्चाओं में कोसा जाता है। यह कहा जाता है कि आज हमारी शिक्षा व्यवस्था के सामने जो चुनौतियां हैं और इसकी जो स्थिति है उसकी बदहाल ज़िम्मेदारी मैकॉले की ही है। यह सवाल पूछना लाज़मी है कि क्या यह एक संतोषजनक जवाब माना जाए? मैकॉले की शिक्षा पद्धति के वे कौन से महत्वपूर्ण पहलू हैं जो हमारी आज की शिक्षा व्यवस्था से ऐसे चिपक गये हैं कि हम सब चाह कर भी उनसे अलग नहीं हो पा रहे हैं। या फिर मैकॉले का नाम सिर्फ़ एक बहाना है और असल में हम सभी लोगों को शिक्षा में शामिल ही नहीं करना चाहते? शिक्षा के संवादों और परिचर्चाओं में संवैधानिक लक्ष्यों को हासिल करने के संबंध में लाचारी नज़र आती है। इस लाचारी का ठीकरा मैकॉले के सिर फोड़कर निश्चिंत होना किस हद तक उचित है?

'मैकॉले, एलफिन्सटन और भारतीय शिक्षा' पुस्तक में 18 चर्चित विद्वानों के लेख हैं।
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5 सदस्यीय संपादक मंडल ने किताब का संपादन किया है

PC: Vani Prakashan

'मैकॉले, एलफिन्सटन और भारतीय शिक्षा' का संपादन पांच सदस्यों वाले संपादक मंडल ने किया है।

एच.के. दीवान अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं। इनका प्रमुख कार्य विश्वविद्यालय के उच्च शिक्षा कार्यक्रमों को दो भारतीय भाषाओं, हिन्दी और कन्नड़ में शुरू करने, देश में हिंदी और कन्नड़ में विमर्श, चिन्तन शुरू करने के प्रयास में योगदान देना है। इन्होंने एकलव्य और विद्या भवन के साथ कई सालों तक काम किया है और अभी भी जुड़े हैं। वे देश में स्कूल, शिक्षक और उच्च शिक्षा में बदलाव के प्रयासों से 35 वर्ष से जुड़े हैं। 
 
रमाकांत अग्निहोत्री दिल्ली विश्वविद्यालय से भाषाशास्त्र के प्रोफ़ेसर के पद से रिटायर हुए हैं। अभी वे विद्या भवन सोसायटी, उदयपुर (राज.) में कार्यरत हैं। प्रायोगिक भाषाशास्त्र, शब्द-संरचना और सामाजिक भाषाशास्त्र जैसे विषयों को लंबे समय से पढ़ाते रहे हैं और उनके बारे में विस्तृत लेखन किया है। 

अरुण चतुर्वेदी मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर में राजनीतिशास्त्र के भूतपूर्व आचार्य। वर्तमान में विद्या भवन से जुड़े हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति, भारतीय विदेशनीति, अंतरराष्ट्रीय क़ानून, मानव अधिकार और ज़मीनी स्तर पर नियमित लेखन।
 
वेददान सुधीर विद्या भवन इन्स्टीट्यूट में 35 वर्ष से राजनीतिशास्त्र का अध्यापन तथा इसी संस्थान में निदेशक। ‘भारतीय संविधान के चर्चित प्रसंग’, ‘भारतीय संविधान और राजनीति’, ‘पुस्तकों का लेखन’, ‘भारत में पंचायती राज’ और ‘21वीं शताब्दी के सरोकार’ पुस्तकों का संपादन। 
 
रजनी द्विवेदी शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यचर्या और पाठ्यपुस्तक निर्माण, पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेखन और सम्पादन, शोध इत्यादि कार्य से जुड़ी रही हैं। शिक्षकों और बच्चों के लिए सीखने-सिखाने और भाषा संबंधित सामग्री निर्माण में रुचि।

इस किताब को इस लिंक पर क्लिक कर ख़रीद सकते हैं - 

http://www.vaniprakashan.in/details.php?prod_id=8213&title=
Macaulay,%20Elphinstone%20Aur%20Bhartiya%20Shiksha
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