इतिहास को फिर से देखने-लिखने की आवश्यकता, स्त्री को किसी जाति विशेष से जोड़कर न देखा जाना, युद्धों के इतिहास की पुनर्समीक्षा और स्त्री संघर्ष को अन्य संघर्षों से अलग रूप में देखने की सिफ़ारिश किन कारणों से की जाती रही है, इसका ज्वलंत उदहारण है प्रो. गरिमा श्रीवास्तव की डायरी- 'देह ही देश'।
क्रोएशिया प्रवास में लेखिका ने जिस डायरी को अपनी अथक साहस और सत्य को पहचानने तथा उसे अपने करुण शब्दों में ढाल कर व्यक्त किया है वह किसी भी बुद्धिजीवी की दृष्टि को बदलने के लिए पर्याप्त है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इतिहास ने जिन संघर्षों की गाथा हमारे सामने पेश किया है, वहां आधी आबादी के अस्तित्व पर विचार लगभग नगण्य है। देह ही देश में दर्ज घटनाओं का विवरण वैश्विक स्तर पर दर्ज किए गए ऐतिहासिक घटनाओं को स्त्री संबंधी दृष्टि से देखने की अपील करती है।
युद्धों का इतिहास हो या फिर वर्चस्व का वर्तमान दौर हो हर लड़ाई में स्त्रियों के अस्तित्व को कैसे कुचला और रौंदा गया है इसका करुण दर्दनाक ब्यौरा हमें इस डायरी में देखने को मिलता है।
इस डायरी को पढ़कर जैसे पाठक एक शून्य में पहुँच जाता है। जैसे पीछे लौटकर पुनः यात्रा शुरू करने की इच्छा तीव्र हो जाती है और अतीत की उस यात्रा में जो उपेक्षित रह गया है, उस पर पुनः विचार करने की एक छटपटाहट पैदा होती है। यही कारण है कि लेखिका ने निष्पक्ष होते हुए सिर्फ़ घटनाओं के सच को ही नहीं व्यक्त किया है बल्कि स्त्रीवादी संगठनों द्वारा की गयी उपेक्षा के सच को स्पष्ट रूप में प्रकाश में लाया है।
विश्व के लगभग सभी युद्धों के दौरान लाखों स्त्रियों के साथ जघन्य अपराध किए गए और इन गंभीर अपराधों पर कभी भी उस रूप में चर्चा नहीं की गई जिसकी जरुरत थी। लेखिका ने स्वयं भी लिखा है कि “इतिहास के पन्नों का युद्ध और झेले गए युद्ध में बड़ा फ़र्क होता है। जिसने युद्ध की विभीषिका झेली है, उसका जिक्र किताबें नहीं करती।”
ध्यान देने की बात यह है कि जब युद्ध पीड़ित महिलाओं के आधार पर जिस डायरी को लिखा गया है जब उसे पढ़कर सामान्य स्तर पर मस्तिष्क का लगभग हर कोण हिल जाता है तो वास्तविक स्थितियां कैसी रही होंगी? शायद यही कारण है कि जब इस डायरी पर मैं लेखिका से बात कर रहा था तब वो बार-बार जैसे अतीत के किसी मोड़ पर छूट जाती थी। उस मोड़ से कभी आधा लौटती तो कभी लौटती ही नहीं। समझा जा सकता है कि तर्क- कुतर्क की इस दुनिया में वह एक ऐसा सच समझ और लिख रही थी जिसे वगैर संवेदनाओं के समझना लगभग मुश्किल है।
बालात्कार के कारण लाखों की संख्या में गर्भवती हुई महिलाएं, किसी माँ के सामने उसकी बेटी के साथ बालात्कार, किसी के इनकार करने पर उसकी बर्बर हत्या, रोज सामूहिक बालात्कार और अंत में लेखिका की स्टूडेंट का पढाई के खर्च के लिए वेश्यावृति का सहारा लेना।
ये घटनाएँ सिर्फ इस डायरी का सच नहीं है बल्कि हमारी दुनिया का ऐसा नंगा सच है जिसपर हमारे समाज में बात करने भर से भी नैतिकता पर आंच आ जाती है। ऐसे में इस सच को तलाशना, इस भोगे हुए सच की शय्या पर सोई हुई निरपराध महिलाओं को जगाना, उसकी आँखों में मित्रता का विश्वास भरना और उसपर लिखना सिर्फ़ साहस भर का कार्य नहीं बल्कि अपनी मानसिक स्थिति को चुनौती देना भी है।
डायरी में बोस्नियाई स्त्रियों के प्रति यौन हिंसा के संबंध में अमेरिकी स्त्रीवादियों और स्वयंसेवी संस्थाओं के स्त्रीविरोधी सच को व्यक्त करने का साहस लेखिका के सत्य के प्रति आग्रह को तो दिखाता ही है साथ ही संस्थाओं के मूल्यांकन के प्रति समाज को जागरूक भी करता है।
“देह ही देश” अतीत और वर्तमान पर एक संरचनात्मक सवाल खड़े करती है, जहाँ आंदोलन और प्रतिरोध जैसे सामाजिक प्रतिबद्धता के सबसे सुंदर शब्दावली भी कुरूप नजर आने लगते हैं। लेखिका सच ही कहती है कि “हम अपने समाज के पुरुषों को यह तालीम क्यों नहीं देते कि स्त्रियों के साथ सामान्य जीवन में कैसे व्यवहार किया जाए ? स्वाभाविक है हम सामाजिक मूल्यों पर आधारित तालीम की व्यवस्था में शिकस्त खाई दुनिया हैं।
स्त्री संघर्ष और समस्याओं के व्यावहारिक पक्ष को समझने के संदर्भ में यह डायरी हमेशा एक 'कालजयी सत्य का साहित्य' के रूप में अध्ययन किया जाएगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि “देह ही देश” जैसी डायरी के लिए लेखिका के प्रति समाज जितना भी आभार प्रकट करे वह कम ही होगा।
7 वर्ष पहले