गरम भात की ख़ुशबू कैसी होती है, मैं नहीं जानता। लेकिन ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके जीवन से भात नदारद है। ऐसे लोग गरग भात की ख़ुशबू बहुत अच्छे से पहचानते हैं। खाए-पिए अघाए लोगों ने इस बात की कभी परवाह ही नहीं की, कि कैसी होती होगी गरमा-गरम खाने की ख़ुशबू, लेकिन दूर बैठा कोई भूखा शख़्स उस ख़ुशबू को पहचानता है। मेरी माँ कहती हैं कि भूख में तो गूलर भी पकवान लगता है, तब भात तो स्वादिष्ट व्यंजन नज़र आता होगा उनको, जिनके पेट में आग लगी हो। अंतड़ियाँ सूखकर कांटा हो गई हों, और पेट जो सामने आ जाए उसे खाने को राज़ी हो।
पिछले दिनों एक किताब पढ़ी। किताब पढ़कर मैं अंदर तक सिहर गया। मनोरंजन ब्यापारी की किताब 'भागा हुआ लड़का' है ही कुछ ऐसी कि यह आपको आपके भूखे पेट न रह जाने के प्रिविलेज के लिए आपको बार-बार धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए उकसाएगी। पता नहीं किसका धन्यवाद। या शायद उस हर चीज़ का धन्यवाद जिसकी वजह से आपके पेट में अन्न का एक दाना भी गया हो। खाना बरबाद करते हुए आप अपने आप पर हर बार लानत भेजेंगे।
भागा हुआ लड़का कहानी है एक ऐसे ही क़िरदार की जो जीवन और भूख से त्रस्त है। फिर भी जी रहा है, क्योंकि उसका नाम उसे मरने से रोकता रहता है। जब किरदार का नाम जीवन हो तो मरने का कोई विकल्प नहीं रहता। मरना तो आसान है पर मरते हुए जीना कितना कठिन है यह क़िरदार आपको बताएगा।
पिता ग़रीबदास ग़रीबी से पीड़ित है, और बेटा जीवन अपने और अपने परिवार के जीवन और दुखों से। वह हर उस जगह पर लूटा जा रहा है जहाँ लुट बैठने की कोई गुंजाइश भी नहीं थी। या थी भी तो वह भोला मन कभी समझ ही नहीं सका। ग़रीबी और भोलापन इंसान को दोतरफा प्रताड़ित करते हैं। यही जीवन के साथ हो रहा है, ये कहानी एक ऐसे नायक की है जो परिवार का बोझ संभालने के लिए घर से भागता तो है, लेकिन ख़ुद के खाने तक का इंतज़ाम नहीं कर पाता। हर जगह उलाहने और निर्वासन ही उसके हिस्से आता रहा है। थककर वह लौटने का विचार करता है। लेकिन लौटने पर भी ख़ाली हाथ ही है। उसके पास ज़िल्लत के अलावा कुछ नहीं। 'जीवन' को जीवन से कुछ नहीं मिला, न सर के ऊपर छत, न तन ढकने को कपड़े और न पेट भर भात।
जीवन की इस कहानी से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। यह कहानी वैसे तो मूल रूप से बांग्ला में है, पर इसका अनुवाद बहुत सुंदर हुआ है। अमृता बेरा अनुवादक हैं, और निश्चित तौर पर अनुवाद में यह उनका बेहतरीन काम है। किताब को एका ने प्रकाशित किया है। मन हो तो पढ़ सकते हैं। मैं तो यही कहूँगा कि पिछले पाँच-सात सालों में मैंने इससे बेहतर कोई अन्य किताब नहीं पढ़ी।
समीक्षक - अंकुश कुमार