हिय की आँखों से अपलक निहारिए बालकृष्ण भगवान का यह सुंदर विग्रह....
मुख सम्मुख तेरे करूँ, खूब निहारूँ नैन।
निरखूँ छवि मनमोहिनी, मन को पड़ता चैन।।
शब्दों को सुंदर करें, श्लेष, यमक अनुप्रास।
अलका सुंदर तब लगे, कान्हा जब हो पास।।
राधा का तुम प्रेम हो, मीरा के तुम प्रान।
पांचाली की प्रार्थना, अलका के प्रतिमान।।
तू तो धन्ना सेठ है, मेरी क्या औकात।
जो भी मैं हूँ पा रही, सब तेरी सौगात।।
रुस्तम तू तो है छुपा, चुप-चुप करता काम।
बिन बोले ही दे सदा, फूलों सा आराम।।
पगड़ी बनकर सज रहे, सर पर मेरे लाल।
"बड़का' है 'उत्सव' सुनो, 'छुटका' है 'गोपाल'..
ये 'अलका के कृष्ण' हैं। अगर आप इस संग्रह के एक-एक दोहे की भाव-गंगा में भक्ति-भाव से अवगाहन करेंगे तो पाएंगे कि राधा के कृष्ण, मीरा के कृष्ण और यशोदा के कृष्ण से अलका के कृष्ण कतई भिन्न नहीं.. वही प्रेम। वही लगाव। वही भक्ति। वही भाव। वही अनन्यता। वही निश्छलता। वही दर्शन। वही आकर्षण। वही लगन। वही डुबन। वही छुअन। वही नमन..अब कोई दीवाना कहे या पागल! क्या परवाह! किसका डर! कैसी फिकर..अब तो बस कृष्ण के संग रहना है। कृष्ण के संग बहना है। कृष्ण को ही सुनना है। कृष्ण से ही कहना है। कृष्ण ही हैं कण-कण में। कृष्ण ही हैं क्षण-क्षण में..कृष्ण ही हमारे हैं। कृष्ण ही सहारे हैं। कृष्ण ही भँवर में हैं। कृष्ण ही किनारे हैं।
दुख- सुख, मान-अपमान, कृष्ण के सब रंग हैं। कृष्ण ही अंग संग हैं। कृष्ण ही सब अंग हैं। कृष्ण ही दो पैर हैं। कृष्ण ही दो हाथ हैं। कृष्ण हमारे नाथ हैं। कृष्ण ही बस साथ हैं। कृष्ण ही अब सोहे हैं। कृष्ण ही मन मोहे हैं। कृष्ण ही हर कविता हैं। कृष्ण ही सब दोहे हैं। जीवन की हर क्रिया में परमात्मा से योग होने का संयोग कितना सुखद अनुभव है, इसकी अभिव्यक्ति देखनी हो तो यह संग्रह आपके लिए है।
यह सृजन किसी भक्ति या भजन से कम नहीं। अलका ने ये दोहे ही नहीं रचे, बल्कि इन दोहों को रचते-रचते रचनाकार को ही पा लिया है। अगर आप भी पाना चाहते हैं भगवान, तो ये दोहे आपके लिए प्रस्तुत हैं श्रीमान..
पाँच वर्ष से अलका अग्रवाल के साथ रह रहे लड्डू गोपाल
चौंकिए मत। मैं बताता हूँ कि आखिर ये माजरा क्या है! हुआ ये कि द्वापर के बाद कलयुग में कान्हा थोड़े व्यथित थे तो एक दिन राधा जी से कहने लगे कि कलयुग में भक्तों की तो जगह-जगह भारी भीड़ है पर सच्ची भक्ति देखने को नहीं मिलती। मैं हर व्यक्ति के हृदय में ही रहता हूँ, फिर भी विकारों से भरे हृदय के कारण कलयुग के लोग मुझे देख नहीं पाते.. कन्हैया यह सब कहते हुए अपनी समूची सृष्टि पर दृष्टि डाल ही रहे थे कि उन्हें यकायक आगरा में 'अलका अग्रवाल' जी दिखाई दीं। निश्छल.. अलबेली.. दीवानी.. 'स्व' भाव में मगन.. जो तुरंत कर दें सृजन..फिर क्या था, कान्हा निहाल हो गए। कान्हा ने कृपा कर दी। उन्होंने अलका जी को अपना लिया। अलका जी को अपनी माँ बना लिया। अब वे पाँच वर्ष से वही हैं। अलका जी के संग संग रहते हैं। पढ़ते हैं। खेलते हैं। अलका जी भी अब उन्हें अपने बच्चे (लड्डू गोपाल) की तरह खिलाती हैं। उनसे दिन- रात बतियाती हैं। उन्हें देखकर इतराती हैं। इठलाती हैं। इसी भाव-दशा में वह जो कुछ रचती- रचाती हैं, उसकी ही एक झलक है यह संग्रह..। आप भी हिय की आँखों से अपलक निहारिए 238 दोहों के रूप में बालकृष्ण भगवान का यह सुंदर विग्रह..
इन दोहों ने कर दिया इतना भाव-विभोर
चित्त-हरण कर ले गया मेरा माखन चोर
- कुमार ललित