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कश्मीर की रानी दिद्दाः हिंदुस्तानी इतिहास के गलियारों में गुमनाम लेकिन सबसे महान महिला शासक

सारंग उपाध्याय

Book Review
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इतिहास सत्ता के गलियारों से निकली हुई कहानियों का दस्तावेज है। उन कथाओं का गुलदस्ता जिसके भीतर महकती उपकथाएं सभ्यता के कालक्रम में दबती, गुजरती विस्मृति के घटाटोप में समाहित हो गई हैं। हिंदुस्तान का बीता हुआ कल अपने अंदर शासकों, सल्तनतों की उन दास्तानों को संजोए हुए है जिनके वीर नायक और उनके कारनामे कभी सामने नहीं आए। हां जिक्र जब भी वक्त के साथ छिड़ा तो भारत के हाथ में अपनी ही महानता का नया अध्याय हाथ लगा। समय का वह टुकड़ा नजर आया जिसकी परतों में एक सभ्यता का चमकीला काल दर्ज था।

कश्मीर की महिला शासक दिद्दा का इतिहास कालक्रम में बदलती और हस्तांत्रित होती हुई भारत की सत्ता का ऐसा ही अध्याय है, जो बताता है कि कैसे भारत के एक भू-भाग की बागडोर एक महिला संभालती है और महिला सशक्तिकरण का नया इतिहास रचती है।
 
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बहरहाल, जिन्होंने कल्हण की 1148-49 में लिखी गई महान पुस्तक कल्हण की राजतरंगिणी पढ़ी है वे दिद्दा के बारे में थोड़ा बहुत तो परिचित होंगे। संस्कृत में लिखी इस पुस्तक में 8 तरंग यानी अध्याय हैं जबकि कुल 7826 श्लोक हैं। इस पुस्तक में संस्कृत के इस कवि ने दिद्दा का जिक्र किया है।

यकीनन, इतिहास के पन्नों में बतौर कश्मीर की महिला शासक दिद्दा के जीवन का पुनर्पाठ किश्तों में यहां-वहां हुआ है, लेकिन दिद्दा के पूरे चरित्र, उसके परिवेश और एक महिला के रूप में उसकी शक्ति, कमजोरियों के बारे में एक मुकम्मल काम सामने नहीं आ पाया। हां छिटपुट प्रयास लेखों, इतिहास के दस्तावेजों और जुबानी कथाओं में दर्ज होते रहे हैं।

बहरहाल, अंग्रेजी के लेखक आशीष कौल की किताब 'Didda The warrior Queen of kashmir' कश्मीर की वीरांगना महिला शासक के बारे में खींचा गया एक संपूर्ण चित्र है।
 

रूपा पब्लिकेशन से प्रकाशित यह किताब भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण के विकास में एक नया अध्याय जोड़ती है। आशीष कौल की यह किताब इतिहास के भीतर एक रचनात्मक और रोचक तरह का प्रवेश है। ऐतिहासिक उपन्यास की शक्ल में तैयार की गई इस किताब में लेखक ने दिद्दा के जीवन के कई पहलुओं को छूने की कोशिश की है। 6 साल रिसर्च के बाद सामने आया यह काम एक लेखकी की ओर से भारत को दिया गया उपहार है।

किताब में दिद्दा उसके जीवन की त्रासदियां, पारिवारिक पक्ष, जीवन और उसके बीच शासन के साथ घट रही घटनाएं दिद्दा को भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे अहम वीरांगना और महान महिला शासक के रूप में सामने लाती है। किताब में 1000 साल से ज्यादा पुराने समय के भीतर एक महिला के निजी, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन के भीतर की त्रासदियों और चुनौतियों को बेहद अलग तरह से रखा गया है।

इस किताब में शारारिक रूप से कमजोर, परिवार से उपेक्षित एक लड़की के कश्मीर को संभालने की यात्रा बेहद संवेदनशील और अनूठी बन पड़ी है। आशीष देश के भीतर महिला सशक्तिकरण की दिशा में दिद्दा को सामने लाकर नई प्रेरणा सामने रखते हैं। वे तकरीबन हजार साल पहले सामाजिक चेतना की नई योद्धा से हमारा परिचय कराते हैं। पति की मृत्यु के बाद सती ना बनकर साम्राज्य की बागडोर अपने हाथ में रखने वाली दिद्दा भारत की एक नई नायिका के रूप में सामने आती है।

 

अमर उजाला से खास बातचीत में आशीष बताते हैं कि कल्हण की कल्हण की राजतरंगिणी में दिद्दा का जिक्र थोड़ा सा आया है, लेकिन उनके पास यह कहानी उनकी नानी से आई। नानी उन्हें ये कहानी सुनाती थी। वे कहते हैं कि- उनकी नानी दिद्दा के वंश की ही थीं वे पुंछ राजौरी के राजा की भांजी थीं। आशीष के मुताबिक दिद्दा भारत की ऐसी पहली महिला शासक थी जिन्होंने सबसे ज्यादा समय तक 44 साल तक राज किया। दिद्दा अपाहिज होने के बावजूद अपनी सैन्य क्षमता, कुशलप्रबंधन जितनी प्रखर और मजबूत थी वैसी महिला शासक उस समय पूरी दुनिया में नहीं थी।

आशीष बताते हैं कि दिद्दा की सैन्य कुशल प्रबंधन क्षमता और बतौर महिला शासक राज करने की  नीति-रीति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने अफगानिस्तान से कश्मीर पर आक्रमण करने आए शासक की सेना को केवल 44 मिनट के अंदर हरा दिया और उसका सिर हाथी से कुचलवा दिया।

आशीष इस किताब की जरूरत के बारे में बताते हुए कहते हैं कि आज जबकि महिलाओं के पास सुविधाएं और संसाधन है  ऐसे में हमारी नई पीढ़ी को दिद्दा जैसी महिला के बारे में भी पता होना चाहिए जिसकी हिम्मत, साहस और कुशलता का लोहा उस समय पूरी दुनिया में बजता था। दिद्दा की कहानियां जैसे-जैसे भारत में फैलेगी और पहुंचेगी वह हमारी नई रोल मॉडल के रूप में सामने आएगी।

आशीष की यह किताब जल्द ही हिंदी और अन्य भाषाओं में भी पाठकों के लिए उपलब्ध रहेगी।

किताब- दिद्दा द वॉरियर क्वीन ऑफ कश्मीर
प्रकाशन- रूपा पब्लिकेशन
लेखक-आशीष कौल
भाषा- अंग्रेजी

लेखकः आशीष कौल कश्मीरी मूल के हैं। वे इससे पहले कश्मीर पर ‘रिफ़्यूजी कैंप’ नाम से हिन्दी में किताब लिख चुके हैं, जो लोकप्रिय पुस्तकों में शामिल रही।
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