मार्च महीने में अचानक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की कुर्सी चली गई थी। त्रिवेन्द्र की कुर्सी तब गई, जब उन्हें हटाने की मांग करने में जुटे भाजपा के नेता दिल्ली दौड़-दौड़कर पस्त हो चुके थे। त्रिवेन्द्र के उत्तराधिकारी तीरथ सिंह रावत बने। रावत भी पद पर बहुत दिन नहीं रह पाए। उन्हें कोरोना की दूसरी लहर, अटपटे बयान और परिस्थितियों ने अपना शिकार बना लिया। तीन महीने के भीतर उत्तराखंड को तीसरे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मिले और धामी के कामकाज से फिलहाल भाजपा मुख्यालय संतुष्ट है। उत्तराखंड भाजपा के नेताओ की भी शिकायत न के बराबर है। वहां भी विधानसभा चुनाव होना है।
विधानसभा चुनाव की पाइपलाइन में देश का सबसे अहम राज्य उ.प्र. है। कोरोना की दूसरी लहर के उ.प्र. में राजनीति का पारा बहुत गरमाया, लेकिन अपनी चतुराई, पकड़, सूझबूझ से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बच गए। पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री को लेकर उठ रही नाराजगी पर भी भाजपा ने करीब-करीब पर्दा डाल दिया है। भाजपा में संगठन और सरकार के स्तर पर अब उ.प्र. में मुख्यमंत्री बदलने, वहां मंत्रिमंडल विस्तार करने आदि जैसी कोई बड़ी चर्चा नहीं है। पार्टी के नेताओं को भी लग रहा है कि राज्य सरकार से जनता की नाराजगी को काबू करने में मदद मिली है।
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प्रधानमंत्री ने काम करने में शिथिलता बरतने वालों के खिलाफ कार्रवाई का संदेश देते हुए अपने केंद्रीय मंत्रिमंडल से कई विश्वस्त, हाई प्रोफाइल मंत्रियों को बाहर करके संगठन को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी सौंप दी है। इसमें पूर्व स्वास्थ्य कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, टेलीकॉम और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद समेत तमाम चौंकाने वाले नाम रहे। लोगों को आश्चर्य तब भी हुआ जब प्रधानमंत्री ने थावर चंद गहलोत को मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिलाकर और उन्हें कर्नाटक का राज्यपाल बनाए जाने पर सहमति दे दी। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री बनाया। पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामों से त्रस्त जनता को एक संदेश देने की कोशिश की और शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को भी शिक्षा मंत्रालय से मुक्त किया।
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बीएस येदियुरप्पा को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से हटाना भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए सबसे टेढ़ा काम था। इसके दो अहम कारण थे। पहला यह कि येदियुरप्पा की लिंगायत समाज में मजबूत पकड़ है। यह कर्नाटक का प्रभावी समाज है। दूसरा कारण येदियुरप्पा का राजनीतिक मिजाज था, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी से भेंट के बाद मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के इस्तीफा देने की अटकले लगने लगी थी। तीन चार दिन के भीतर खुद येदियुरप्पा ने इसकी घोषणा कर दी। इस तरह से भाजपा ने चुनावी राज्यों में सत्ता का चेहरा बदलकर राज्य सरकार के खिलाफ जनता के गुस्से को कम करने की रणनीति अपनाई है। इसी कड़ी में गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी भी शामिल हो गए हैं।
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भाजपा के भीतर शिवराज सिंह चौहान के मध्यप्रदेश के सीएम बनने के छह माह बाद से इस तरह की चर्चा चल रही है। विजय रुपाणी के इस्तीफा देने के बाद म.प्र. के ही एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने चुटकी भरे अंदाज में कहा कि हमारे यहां कुछ होगा? हालांकि शिवराज सिंह चौहान लगातार जनता की नब्ज टटोलकर फैसला लेने में पूरा जोर लगा रहे हैं। केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को विश्वास में लेकर शिवराज सिंह चौहान म.प्र. में काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री कृषि मंत्री तोमर पर काफी भरोसा करते हैं। तोमर राज्य के प्रभावशाली नेताओं में आते हैं।
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गुजरात के सीएम विजय रुपाणी के इस्तीफा देने पर गजब की प्रतिक्रिया आई है। हार्दिक पटेल ने इसे नाकामी छिपाना बताया तो वरिष्ठ नेता शंकर सिंह वाघेला ने कहा कि विजय रुपाणी दिल्ली से कंट्रोल हो रहे थे। प्रदेश की हालत बहुत खराब है। जनता रुपाणी से बहुत नाराज है। भाजपा नेतृत्व द्वारा सीएम या मंत्री का चेहरा बदलने के सवाल पर कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि यह भाजपा का अंदरुनी मामला है। जबकि कानून मंत्रालय के पूर्व संयुक्त सचिव पीबी सिंह कहते हैं कि इसका फायदा मिलेगा। सेफोलॉजिस्ट अजय कुमार कहते हैं कि आप केंद्र में देख लीजिए। प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार के बाद जनता की नाराजगी थामने में काफी मदद मिली। प्रधानमंत्री मोदी लगातार सबसे लोकप्रिय नेता बने हुए हैं। काशी में संघ और भाजपा से जुड़े प्रचारक का कहना है कि उ.प्र. में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अब जनता की काफी शिकायतें दूर हो गई हैं। उत्तराखंड में भी सबकुछ ठीक चल रहा है।
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