सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हरियाणा सरकार की उस याचिका पर राकेश टिकैत, दर्शन पाल और गुरनाम सिंह सहित 43 से अधिक किसान नेताओं से जवाब मांगा, जिसमें आरोप लगाया गया है कि वे सड़क नाकाबंदी को हटाने के मुद्दे को टालने के लिए राज्य पैनल के साथ बातचीत में भाग नहीं ले रहे हैं। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इन किसानों से पक्षकार बनने के मामले पर भी जवाब मांगा है। वहीं जस्टिस एस के कौल और एम.एम सुंदरेश की पीठ ने इस मामले पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि अगर आपने 43 व्यक्तियों को पक्षकार बनाया है, तो आप इस जिम्मेदारी को कैसे पूरा करेंगे। मेहता ने कहा कि इस मामले में किसान नेता आवश्यक पक्ष हैं और वह उन पर नोटिस की तामील सुनिश्चित करेंगे।
मेहता ने कहा कि शुक्रवार, यानी 8 अक्तूबर को इस याचिका पर सुनवाई की मांग करता हूं। लेकिन अदालत ने कहा कि इस मामले पर अगली सुनवाई दशहरा छुट्टी के बाद होगी।बता दें कि हरियाणा सरकार ने अपनी याचिका में किसान आंदोलन के कारण राजमार्ग बंद होने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर समस्या के हल के लिए विभिन्न किसान संगठनों के 43 लोगों को पक्षकार बनाने का आग्रह किया था।
वहीं इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को लखीमपुर खीरी की घटना का जिक्र करते हुए कहा जब ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं होती हैं तो कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होता है। अदालत ने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा कि प्रदर्शनकारी दावा तो करते हैं कि उनका प्रदर्शन शांतिपूर्ण है, लेकिन जब वहां हिंसा होती है तो कोई जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं होते हैं। वहीं केंद्र की तरफ से पेश अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि लखीमपुर खीरी जैसी घटनाओं को रोकने के लिए किसानों के विरोध प्रदर्शन पर तुरंत रोक लगाने की जरूरत है।
कृषि कानूनों पर फिलहाल रोक तो फिर प्रदर्शन क्यों: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने किसान महापंचायत से पूछा कि जब हमने तीन कृषि कानूनों पर फिलहाल रोक लगा रखी है, फिर सड़कों पर प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं? किसान महापंचायत के वकील ने कहा कि उन्होंने किसी सड़क को ब्लॉक नहीं कर रखा है। इसपर बेंच ने कहा कि कोई एक पक्ष अदालत पहुंच गया तो प्रदर्शन का क्या मतलब है? सरकार ने आश्वासन दिया है कि वे इसे लागू नहीं करेंगे फिर प्रदर्शन क्यों जारी है?