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अमर उजाला शब्द सम्मान 2025: सितार के तार गढ़ते गए शब्द, बनती गईं सुरों की मालाएं; हर तान में मानो ठहर गई शाम

हिमांशु चंदेल

India News Halchal
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                            सुरलहरियों से सजी यह शाम वाकई जादू भरी थी। उस्ताद शुजात हुसैन खान की उंगलियां सितार पर जिस अंदाज से फिर रही थीं, फिजा में धीरे-धीरे रस घोल रही थीं। सुर और संगीत के जादू में मंत्रमुग्ध श्रोता ऐसी यात्रा पर निकल पड़ते दिखे, जहां राग, भाव और मौन...तीनों एकसाथ आत्मा से संवाद करते रहे। सितार के तारों से निकलती हर तान मानो समय को थाम ले रही थी। 
        
                                                    
                            

उस्ताद शुजात हुसैन ने शुरुआत भगवान शंकर पर लिखी अपनी बंदिश दर्शन देहो शंकर महादेव को आवाज देकर की। उस्ताद ने जब अगली धुन अपनी आवाज में बजाई, तो पहले ही अंतरे में दर्शकों की दाद मिलने लगी।

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जब तालियों से गूंज उठा हॉल 
बेहोशी नशा खुश्बू, क्या-क्या न तुम्हारी सांसों में...उस्ताद ने जैसे ही राग का आलाप शुरू किया, हॉल तालियों से गूंज उठा। धीमी, ठहरी हुई और सूक्ष्म गमकों ने राग का स्वभाव बड़ी सहजता से उजागर किया। सितार पर उनके मींड, गमक और स्वर-संयोजन में गायन की सहजता सबने अनुभव की। उस्ताद सुर को सिर्फ साध नहीं रहे थे, बल्कि खुद भी उसे जीते दिख रहे थे। मध्य लय में प्रवेश करते हुए तानों की स्पष्टता और लयकारी पर उनकी अनूठी पकड़ ने श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया।

शुजात हुसैन का ठहराव 
इसमें बेहद दिल-सोज पल तब आता, जब उस्ताद बगैर किसी जल्दबाजी के राग को विस्तार देते। आज के तेज-रफ्तार समय में जहां अमूमन प्रस्तुतियां प्रभाव पैदा करने की होड़ में रहती हैं, वहां शुजात हुसैन का ठहराव एक सशक्त वक्तव्य की तरह लगा। इस दौरान वह वक्त भी आया, जब उस्ताद के सूफीनामा गजल-अशिकों के खुदा...पर अलाप भरते ही श्रोताओं की तालियों और सितार की तान में मानो फर्क मिट सा गया हो। 


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