अंबाला सिटी। बिना ट्रीट किए जिले के 30 प्वाइंट से घग्गर नदी में दूषित और विषैला पानी सीधे ही छोड़ा जा रहा है। इसमें मुख्यत: घेल और इंको नाले से छोड़ा जाने वाला पानी प्रमुख है। इसी तरह राजपुरा की तरफ नेशनल हाईवे से जुड़े नाले का पानी भी घग्गर में ही डाला जा रहा है।
हालात यह हैं कि न बरसाती नालों में ही सीवरेज के कनेक्शन छोड़ दिए गए हैं। इसी तरह फैक्टरियों से निकलने वाले दूषित पानी को भी नालों में छोड़ दिया जाता है। सीवरेज का पानी भी इन्हीं नालों के जरिए घग्गर में जाकर उसे दूषित कर रहा है। इससे न केवल जल प्रदूषण बल्कि भूमि प्रदूषण भी हो रहा है। इस भूमि और जल प्रदूषण से विभिन्न प्रकार के कैंसर, हृदय और मस्तिष्क रोग व पेट संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। पूर्व सिविल सर्जन डॉ. विनोद गुप्ता ने जिला निगरानी कमेटी की बैठक में वर्ष 2017 में इस मुद्दे को उठाया था। बताया था कि घग्गर के पानी से कई क्षेत्रों में सिंचाई होती है। फसलों के जरिए पानी शरीर में प्रवेश करता है। इससे कैंसर बढ़ रहा है। उन्होंने इसके व्यवस्था करवाने का अनुरोध सांसद रतनलाल कटारिया से किया था। वहीं नालों से सीवरेज के कनेक्शन जोड़े जाने के कारण नालों में क्षमता से ज्यादा पानी पहुंचने के कारण हल्की सी बरसात में भी जलभराव की स्थिति बन जाती है।
1450 के पार हो चुकी कैंसर रोगियों की संख्या
जानलेवा कैंसर ग्रामीण के साथ-साथ अब शहरी क्षेत्र में फैल रहा है। जिले में कैंसर के मरीजों की संख्या जहां 1450 पार कर चुकी है तो वहीं अंबाला छावनी और शहर की 20 किलोमीटर की आबादी में मरीजों की संख्या 420 से अधिक है जो कि जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। छावनी के नागरिक अस्पताल में चल रही कैंसर ओपीडी में मरीजों की बात करें तो रोजाना 20 से 25 मरीजों का इलाज किया जा रहा है। इनमें से ऐसे मरीज भी हैं जो पीजीआई चंडीगढ़ इलाज के बाद यहां पर डाक्टरों की देखरेख में अपना इलाज करा रहे हैं।
अंबाला में कौन से हैं प्रमुख नाले
अंबाला की बात करें तो यहां घेल नाला, सुल्लर नाला, एसवाईएल नाला, चौड़मस्तपुर नाला, बकनौर नाला, इंको नाला, गंदा नाला, क्यूनेट नाला, महेशनगर नाला, हाथी खाना नाला और एमसी नाला यह प्रमुख नाले हैं।
क्या है जिले में घग्गर नदी की स्थिति
घग्गर एक महत्वपूर्ण नदी है। यह उत्तर-पश्चिम के कुछ हिस्से से अंबाला जिले में बहती है। नदी हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले से निकलती है और नारायणगढ़ से जिले में प्रवेश करती है। यह तहसील अंबाला शहर के पास कुछ हिस्से में बहती है और फिर जिले के बाहर जिला सीमा के समानांतर बहती है। इसमें केवल वर्षा ऋतु के मौसम में ही पानी होता है। घग्गर की बात करें तो अंबाला के देवी नगर, घेल छोटी और बड़ी, लहारसा, इत्यादि क्षेत्र को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। वहीं नारायणगढ़ से आते हुए भी कई फैक्ट्रियों का पानी इसमें बिना ट्रीट किए छोड़ा जाता है। जोकि सिंचाई के काम आता है।
जिलास्तरीय बैठक के बाद उठाए कुछ कदम
बता दें कि इस पूरे मामले को लेकर डीसी ने जिलास्तरीय बैठक की थी। इसमें पब्लिक हेल्थ, नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण विभाग, पंचायती विभाग व अन्य विभागों के अधिकारी मौजूद थे। बैठक में बताया गया था कि कुल 39 प्वाइंट से घग्गर नदी में नालों का पानी छोड़ा जाता है। इनमें से करीब 9 प्वाइंट के पानी को ट्रीट कर छोड़ा जाता है जबकि शेष को बिना ट्रीट किए सीधे नाले में छोड़ दिया जाता है। डीसी ने बारे में सभी विभागों से एक सप्ताह में रिपोर्ट मांगी थी लेकिन अभी तक इस पर कोई अमल नहीं हुआ।
हमारे अधीन जो भी नाले हैं उनके पानी को सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाएगा। इसके लिए करीब साढ़े 7 करोड़ रुपये का अस्टीमेट तैयार किया है। यह बजट भी पास हो गया है। जल्द ही इन्हीं एसटीपी से जोड़कर पानी को ट्रीट करने के बाद ही घग्गर में छोड़ा जाएगा।
-दिनेश गाबा, एक्सईएन पब्लिक हेल्थ।
हमारे अधीन बरसाती नाले हैं उनका पानी ट्रीट नहीं होता। जहां तक बरसाती नालों में सीवरेज का पानी छोड़ने की बात है तो उसके लिए हमने पब्लिक हेल्थ को लिख दिया है। क्योंकि सीवरेज कनेक्शन देना और मरम्मत का काम पब्लिक हेल्थ के अधीन ही है।
महीपाल, चीफ इंजीनियर नगर निगम।
निश्चित तौर पर नालों का पानी बिना ट्रीट किए घग्गर में डाला जा रहा है। इस बारे में पब्लिक हेल्थ, पंचायती विभाग और नगर निगम के अधिकारियों को कार्रवाई और उचित व्यवस्था के निर्देश डीसी साहब के साथ हुई बैठक में दिए गए थे। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के अनुसार बिना ट्रीट किए नालों का पानी घग्गर में नहीं छोड़ा जा सकता।
नीतिन मेहता, प्रदूषण नियंत्रक अंबाला।
यदि नालों का पानी बिना ट्रीट किए नदी में छोड़ा जाता है तो निश्चित तौर पर विभिन्न प्रकार के कैंसर, हृदय और पेट संबंधित बीमारियों का खतरा बना रहता है। दिमाग संबंधित बीमारियां भी हो सकती हैं। हम अपनी लैब के पानी तक को ट्रीट करने के बाद ही छोड़ते हैं। इसीलिए एसटीपी की व्यवस्था की गई है।
डॉ. कुलदीप सिंह, सिविल सर्जन।