जिला अस्पताल, बीआरडी मेडिकल कॉलेज जैसे नाम से उच्च संस्थान हैं, वैसे ही यहां पर दलालों का नेटवर्क भी हाईप्राेफाइल है। अन्य सरकारी अस्पतालों में दवा, जांच और उपकरण के लिए पर्ची पकड़ाई जाती है, एंबुलेंस मरीज को लेने आती है, लेकिन यहां पर ऐसा कोई काम नहीं होता। बस समानता एक बात की है, जिला अस्पताल से मेडिकल और मेडिकल से लखनऊ रेफर करने के बीच मरीज बिकते हैं तो एम्स से मरीज को मेडिकल रेफर करने के बीच बेचा जा रहा है।
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सस्ते इलाज की चाह में आने वाले मरीजों को जब रेफर किया जाता है तो उन्हें प्राइवेट अस्पताल का पता भी बता दिया जाता है। इस धंधे में एक बार हवालात तक पहुंचे युवक ने नाम न छापने के शर्त पर बताया कि मरीज जैसे ही प्राइवेट अस्पताल के लिए हामी भरता है, उसे बाहर से टैक्सी से जाने की सलाह दी जाती है, ताकि एम्स प्रशासन न फंसने पाए। बुधवार को सिकरीगंज के मरीज के साथ भी ऐसा ही हुआ है, वह ऑटो से नर्सिंग होम गए थे।
कूड़ाघाट रोड पर मेडिकल स्टोर की दुकान।
- फोटो : अमर उजाला।
दवाओं का कमीशन एम्स में भी हर सरकारी अस्पताल की तरह ही है, लेकिन यहां पर नियम कायदे का पालन होता है। मसलन, अन्य सरकारी अस्पतालों में पसंदीदा कंपनी की दवा लिखी जाती है, लेकिन यहां पर ऐसा नहीं होता। यहां पर नियमानुसार दवा के साल्ट का नाम लिखा है ताकि कोई भी जांच हो तो नियम में सही मिले। लेकिन साल्ट की सस्ती दवाएं जिस अमृत फार्मेसी (एम्स परिसर के अंदर) मिलनी चाहिए, वहां पर होती ही नहीं हैं। फिर मजबूरन मरीजों को बाहर खहीदने जाना ही होता है। अब सवाल उठता है कि जब अंदर फार्मेसी है तो ये दवाएं वहां पर क्यों नहीं रखी जातीं।
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एम्स में मरीज माफिया के नेटवर्क का खेल मेन गेट से ही शुरू होता है। मरीज को ठगने के लिए दलालों की कई टोली घूमती रहती है। कुछ बाहर सड़क पार ठेले के दुकान के इर्द-गिर्द रहते हैं तो कुछ गेट पर ही घूमते रहते हैं। मरीज का नंबर लगा है तो ठीक, नहीं तो तत्काल लगवाने तक का जिम्मा उठा लेते हैं। फिर मरीज को सस्ते में दवा दिलाने का झांसा देते हैं। साथ में लेकर जाते हैं और दवा दिलाने के साथ ही अपना नंबर भी दे देते हैं। अब मरीज की हालत खराब होने या फिर उनके कोई परिचित के आने पर लोग सीधे संपर्क करते हैं और फिर ठगी होती है।
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एम्स के आसपास की दुकानों का पर्चा मान्य
दवा की दुकान चलाने वाले एक शख्स ने नाम न छापने के शर्त पर पूरे खेल को बताया। उसने बताया कि अगर कोई मरीज सर्जिकल उपकरण को खुद खरीद लेता है तो इसकी भी एक शर्त है। अगर एम्स के आसपास की दुकानों से खरीदा गया है तो फिर डॉक्टर रशीद रख लेते हैं और उसका इस्तेमाल करते हैं। कहीं और से लाए होते हैं तो उसे लौटा दिया जाता है। मरीज ज्यादा विरोध करता है तो उसे रेफर कर दिया जाता है।
दवा, उपकरण के अलावा नर्सिंग होम के दलालों का नेटवर्क भी सक्रिय है। इसमें ऑटो वालों को सेट किया गया है। ऑटो वाला मरीज को जैसे ही नर्सिंग होम पहुंचाता है, उसका तय कमीशन उसे मिल जाता है। ऑटो वाले मरीज को जिस नर्सिंग में ले जाते है, उसके लिए तीमारदार को यही बताते हैं कि एम्स के डॉक्टर उस अस्पताल में आते हैं। अब एम्स के डॉक्टर से इलाज पाने की चाहत में मरीज चले जाते हैं। इसके पीछे का सबसे बड़ा खेल रेफर का होता है। एम्स जैसा उच्च संस्थान मरीज को बीआरडी मेडिकल कॉलेज रेफर करता है, जबकि नियमानुसार ऐसा नहीं करना चाहिए। बस इसी रेफर मरीज के पीछे एंबुलेंस माफिया का सक्रिय नेटवर्क है।
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केस एक
10 दिन की दवा खरीदी 5635 रुपये में
पांच अगस्त 2023 : देवरिया के जय प्रकाश सिंह ने एम्स के एक विभाग में दिखाया। डॉक्टर ने जांच कराते हुए आठ दवाएं 10 दिन की लिखीं। इसमें से एक भी दवा फार्मेसी पर नहीं मिली। इस पर वह डॉक्टर के पास आए तो उन्हें एम्स के पास स्थित मेडिकल स्टोर पर जाने की सलाह दी गई। वहां पर उन्हें 5635 रुपये खर्च करने पड़े।
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केस दो
अब खर्च करने होंगे 40 हजार
सिकरीगंज के शुक्लपुर निवासी अशोक शुक्ला के कुल्हे की हड्डी टूटी है। दो बार ऑपरेशन थिएटर में ले जाने के बाद 24 हजार पांच सौ रुपये सर्जिकल उपकरण के नाम पर मांगा गया। उन्हें एक दलाल का नंबर भी दिया गया था, लेकिन जब उन्होंने विरोध किया तो मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया। ऑटो से नर्सिंग होम गए। भाई ने बताया कि 40 हजार रुपये खर्च बताया गया।
केस तीन
कान के ऑपरेशन के लिए तीन साल बाद की तारीख
उरुवा बाजार की रूबी सिंह को कान में दिक्कत थी। आठ सितंबर को वह एम्स में किसी तरह से नंबर लगाईं। लाइन लगाकर डॉक्टर के पास पहुंचीं तो उन्हें लगा कि अब उनकी बीमारी का इलाज हो जाएगा, लेकिन जांच के बाद डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह देते हुए जो तारीख दी, वह सुनकर ही उनके होश उड़ गए। उन्हें एम्स ने 23 जून 2026 को भर्ती होने की तारीख दी गई है। अब उनकी मजबूरी है कि वह रुपये अधिक खर्च कर बाहर ऑपरेशन कराएं।
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