प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर
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भारत और उसकी इतिहास दृष्टि
आर्यभट्ट भी नालंदा के प्रमुख रह चुके थे। ह्वेनसांग के समय शीलभद्र यहां प्रमुख थे। यहां विभिन्न विभाग और उनके प्रमुख हुआ करते थे। नालंदा पर एक विस्तृत लेख लिखा जा सकता है, लेकिन इस लेख में हम सिर्फ आधुनिक इतिहासकारों द्वारा जिन पक्षों की उपेक्षा की गई है उसका विश्लेषण कर रहे हैं। नालंदा को समझना इसीलिए जरूरी है, क्योंकि आधुनिक शोध का क्षेत्र बहुत नया है और भारत में ये कार्य 500 ई. (आधुनिक इतिहास के साक्ष्यों के आधार पर) से ही हो रहा था।
महत्वपूर्ण विषय ये है कि नालंदा की स्थापना भी बौद्ध काल की है। इससे पहले जैन काल भी रहा और उससे बहुत पहले वैदिक काल। वैदिक काल को समझने में बड़ी गड़बड़ी ये भी है कि सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक काल को लेकर आधुनिक इतिहास कारों ने घालमेल कर दिया है। सिंधु घाटी सभ्यता को 3300 ई. पू. बताया गया है और वेदों की रचना का काल दो हिस्सों में बांट दिया गया है।
ऋग वैदिक काल को 1500 ई. पू. बताया गया है और उत्तर वैदिक काल, जिनमें बाकी तीन वेदों की रचना हुई, को 1200 ई. पू. का बताया जा रहा है। ये वो तथ्य है जो फिलहाल इतिहास के छात्रों को पढ़ाए जा रहे हैं।
आपको एक और आश्चर्यजनक बात बता दूं, वो आधुनिक विज्ञान जो बिना साक्ष्यों के बात नहीं करता, सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक सभ्यता के संक्रमण काल पर मौन हो जाता है। वो वहां अपुष्ट परिकल्पनाओं जैसे कि शायद जल प्लावन हुआ होगा, शायद युद्ध हुआ होगा, शायद ये हुआ होगा या वो हुआ होगा में उलझ जाता है। आप इस बात कि पुष्टि के लिए आधुनिक इतिहास की पुस्तकों का अध्ययन भी कर सकते हैं।
हाइडलबर्ग जर्मनी की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी है। यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर इंडोलॉजी सर्च करेंगे तो भारतीय परंपरा के मुताबिक विद्या की देवी सरस्वती की तस्वीर दिखाई पड़ती है। वैदिक काल में सरस्वती का महत्व तो है ही, सिंधु घाटी सभ्यता को भी सरस्वती नदी से जोड़ा गया है। निश्चित तौर पर सरस्वती की उपासना सिंधु घाटी काल में भी रही होगी। खुदाई में मिली नटराज की मूर्ति पर भी कोई बात करता नहीं दिखाई देगा। प्रकृति देवी की प्रतिमा को भी सिर्फ साक्ष्य के तौर पर रखा जाता है, उससे किसी विवेचना पर पहुंचने का कोई प्रयास नहीं किया जाता, क्योंकि वो वैदिक काल के बाद में आने की परिकल्पना को झूठला देगी।
निश्चित तौर पर प्रकृति उपासना सिंधू घाटी सभ्यता के दौरान भी होती थी, लेकिन आधुनिक इतिहासकार पूजा पद्धतियों और प्रकृति और देवताओं के प्रादुर्भाव को वैदिक काल या सिंधुघाटी के बाद के काल के तौर पर देखते हैं। कोई भी भारतीय इसे हास्यास्पद मानेगा, लेकिन विडंबना देखिए हमारे आज के इतिहास के छात्र भी यही इतिहास पढ़कर यूपीएससी की परीक्षाएं दे रहे हैं। इनसे आप क्या अपेक्षा करेंगे? ये जो पढ़ेंगे उसी पर आगे की अवधारणाएं बनाएंगे।
भारत में वैदिक परंपरा कभी भी किताबों या लिपि पर निर्भर नहीं थी, इसीलिए तमाम विध्वंसों के बावजूद उसके जस का तस बरकरार रहने पर कोई संदेह नहीं।
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हाइडलबर्ग यूनिवर्सिटी में जिन पाठ्यक्रमों का जिक्र है, उनमें संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए सरस्वती संस्कृत पुरस्कार भी दिया जाता है। इसी तरह हाले विटनबेर्ग की मार्टिन लूथर यूनिवर्सिटी में इंडोलॉजी यानी भारत विद्या पढ़ाई जाती है। माइंत्स में इंस्टीट्यूट फॉर इंडोलॉजी है। ट्यूबिंगन और बॉन यूनिवर्सिटी में भी हर साल कुछ छात्र इंडोलॉजी में दाखिला लेते हैं।
दुनिया की नजर में भारत
जर्मनी में संस्कृत और भारत के इस प्रेम को लिखना इसीलिए आवश्यक है, क्योंकि मैक्समूलर जिन्हें आधुनिक इतिहासकार अपने भारतीय इतिहास के ज्ञान का आधार मानते हैं इसी जर्मनी के थे। उन्हें ये बखूबी पता था कि वेद क्या हैं और भारतीय ज्ञान विज्ञान की परंपरा कितनी प्राचीन है। उनकी अपनी मजबूरियां थीं, उन्हें नौकरी ही इस शर्त पर मिली थी कि वे वेदों को समझकर उनका ईसाईकरण करेंगे, क्योंकि भारतीय जनमानस पर कब्जा करना है तो उनके तौर तरीकों से करना होगा।
इस कुत्सित प्रयास ने भारतीय इतिहास का कचरा कर दिया और संभवतः इसी विडंबना ने वैदिक काल को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा की, जिसे आज का इतिहास कथित तौर पर स्वीकार करता है, जबकि जर्मनी संस्कृत और वेदों के महत्व को समझ गया था और शायद यही वजह है कि आज भी वहां इंडोलॉजी एक महत्वपूर्ण विषय है।
भारत में वैदिक परंपरा कभी भी किताबों या लिपि पर निर्भर नहीं थी, इसीलिए तमाम विध्वंसों के बावजूद उसके जस का तस बरकरार रहने पर कोई संदेह नहीं। यही वजह है कि मैक्समूलर भी अपने समकालीन दयानंद सरस्वती पर ही निर्भर थे।
मैक्समूलर के कार्य पर मैं अलग से एक विस्तृत लेख लिखूंगा, क्योंकि यहां विषयांतर हो जाएगा। मोटे तौर पर ये बात समझ लीजिए कि मैक्समूलर ने वेदों की कांति को धुंधला करके दिखाना चाहा, क्योंकि यदि वैदिक परंपरा के पूर्ण गौरव को सामने रखा जाता तो एक अध्यात्मिक क्रांति पूरे विश्व में देखने को मिलती। भारत में ये प्रयास दयानंद सरस्वती और विवेकानंद जैसे लोगों ने किया, जिसे आदि शंकराचार्य ने शुरू किया था। यही वजह है कि आज भी चाहे आधुनिक इतिहासकार जो कहें, भारतीय वैदिक वांग्मय को लेकर भारतीय विद्वानों के मन में कोई संदेह नहीं है।
आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि आधुनिक इतिहासकारों की भारत को लेकर समझ के साथ ही भारतीय वैदिक वांग्मय की पुनर्स्थापना की एक समानांतर धारा चल रही है। यहां पाश्चात्य शिक्षा पद्धति का ठप्पा लगवाने की हमें कोई जल्दबाजी भी नहीं है। वेदों का मूल तत्व है वसुधैव कुटुंबकम और वैदिक परंपरा का मूल मकसद है सर्वे भवन्तु सुखिनः। अच्छी बात ये है कि जिन्होंने भी इसमें जोड़ तोड़ के प्रयास किए उन्होंने वैदिक परंपरा के साक्ष्य ही प्रस्तुत किए, कोई नुकसान नहीं किया। उदाहरण के लिए मैक्समूलर के कार्य से आधुनिक इतिहासकारों को भी कुछ मिल ही गया नहीं तो वे शायद वैदिक सभ्यता का जिक्र ही न करते।
एक और उदाहरण इस लेख के अंत में रखना चाहता हूं जो बहुत महत्वपूर्ण है। दुनिया के हर इतिहास में महाकाव्यों, कहानियों, कविताओं को विशेष स्थान दिया गया, लेकिन जब भारत के इतिहास की बात होती है तो रामायण और महाभारत जैसे ऐतिहासिक ग्रंथों को सिर्फ काल्पनिक गाथा कहकर इतिहासकार शांत हो जाते हैं।
मेरा दावा है कोई आधुनिक इतिहासकार सिर्फ वाल्मीकि रामायण भर को पढ़ लें तो समझ जाएगा कि नगरीय व्यवस्था को लेकर ही अयोध्या कांड में कितना कुछ लिख दिया गया। इससे न सिर्फ नगरीय जीवन का पता लगता है बल्कि उस समय के लोकाचार और ज्ञान विज्ञान का भी महत्वपूर्ण परिचय मिल जाता है।
भारत भक्ति की भूमि रही है और यहां भक्त और भगवान के संबंध ने ही समाज को बांधे रखा है। ये आज भी अकाट्य सत्य है। मुगलकाल में तुलसीदास जी के भक्तिमार्ग ने इसका जीवंत उदाहरण रखा। यही डर तत्कालीन इतिहासकारों को भी रहा और उन्होंने इतिहास में भारत को कमजोर दिखाने का भरसक प्रयास किया। इन्हीं की शिक्षा प्रणाली पर चले इनके भारतीय चेलों ने यही काम किया और आज भी कर रहे हैं। अब आवश्यकता है कि वैदिक वांग्मय को व्यवस्थित तरीके से पुनर्स्थापित किया जाए, ठीक वैसे ही जैसे आदि शंकराचार्य ने किया था।
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