गिर कर चलना सीख लिया है

                
                                                         
                            हर पल चलते, हर दिन जलते,
                                                                 
                            
रुकते थकते, फिर से चलते ।
हर एक धूप तपन ने भी अब,
शाम को ढलना सीख लिया है ।
गिर कर चलना सीख लिया है ॥

मेहनत की एक अंतिम कश थी,
लहरों में कश्ती बेबस थी ।
विकट समंदर की लहरों से,
मन ने लड़ना सीख लिया है ।
गिर कर चलना सीख लिया है ॥

जीत की जिद थी, मन था उत्सुक,
हर पल बस मेहनत का कौतुक ।
मिली हार की घोर निराशा,
समय व्यर्थ करने में क्या तुक ।
स्वाद जीत का, सबक हार का,
अदब जीत का, सबब हार का ।
हार-जीत के अंतर से अब,
जीवन पढ़ना सीख लिया है ।
गिर कर चलना सीख लिया है ॥
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त