नैनीताल में आगामी राष्ट्रीय जनगणना के बाद उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति में आने वाले संभावित बदलावों को लेकर अपनी गणना अपने गांव अभियान ने कमर कस ली है। उन्होंने अपील की है कि जो लोग आजीविका के कारण शहरों में बस गए हैं, वे अपनी गणना अपने पैतृक गांवों में ही कराएं। यह कदम न केवल गांवों की जनसांख्यिकीय पहचान बचाएगा, बल्कि पहाड़ के हक-हकूक और संसाधनों पर हमारे दावे को भी मजबूती प्रदान करेगा। अभियान के मुख्य संयोजक और वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी जोत सिंह बिष्ट ने नैनीताल क्लब में पत्रकार वार्ता कर कहा आगामी जनगणना केवल एक सांख्यिकीय प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के राजनैतिक भविष्य का निर्धारण करेगी। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि यदि जनगणना के आंकड़ों में पर्वतीय क्षेत्रों की जनसंख्या में भारी गिरावट आई, तो भविष्य में होने वाले परिसीमन के कारण पहाड़ की विधानसभा सीटें कम हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में राज्य की नीति-निर्धारण शक्ति पूरी तरह मैदानी क्षेत्रों की ओर केंद्रित हो जाएगी और पहाड़ का प्रतिनिधित्व लगभग समाप्त हो जाएगा। उन्होंने जनसंख्या के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा पौड़ी और अल्मोड़ा जिले में वर्ष 1971 से अब तक की जनसंख्या में -10 फीसदी तक की गिरावट दर्ज हुई है। इसका मुख्य कारण पलायन है। उन्होंने अपील की है कि जो लोग आजीविका के कारण शहरों में बस गए हैं, वे अपनी गणना अपने पैतृक गांवों में ही कराए। इस मौके पर उनकी पत्नी धर्मा बिष्ट, पूर्व सैनिक सोहन लाल खंडूरी मौजूद रहे।