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रक्षाबंधन पर भद्रा है या नहीं... क्या होता है श्रावणी उपाकर्म, VIDEO

अमन विश्वकर्मा Updated Fri, 08 Aug 2025 06:02 PM IST

पंडित वेद प्रकाश मिश्रा ने बताया कि श्रावणी उपाकर्म के दो पक्ष हैं- प्रायश्चित संकल्प और संस्कार। ब्राह्मण अपने यजमानों के शुद्ध और अशुद्ध सभी प्रकार के कार्य करवाते हैं। उसके प्रायश्चित से बचने के लिए विशेष संकल्प लिया जाता है। प्रायश्चित्त संकल्प में हेमाद्रि स्नान संकल्प। (यह स्नान विशेष रूप से तीर्थों, नदियों, व्रतों या पर्वों के समय किया जाता है, जिसमें जल, द्रव्य (जैसे तिल, पुष्प, दूध आदि) और मंत्रों का प्रयोग करके देवताओं को स्नान कराया जाता है।) गंगा में आचार्य के समक्ष गोदुग्ध, दही, घृत, गोबर और गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से स्नानकर और उसको मंत्र उच्चारण के साथ गंगा में लगभग दो घंटे खड़े होकर पंचगव्य के रूप में ग्रहण किया जाता है। जिससे वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए पापकर्मों का प्रायश्चित्त कर जीवन को सकारात्मकता दिशा मिलती है। या यूं कहें कि नए जीवन की प्राप्ति होती है। स्नान के बाद ब्राह्मण जन आश्रमों में विधि विधान से ऋषिपूजन, सूर्य पूजन एवं यज्ञोपवीत पूजन करते हैं और उसी पूजा किए हुए जनेऊ को साल भर तक पहनते हैं। संस्कार : उपरोक्त कार्य के बाद नवीन यज्ञोपवीत या जनेऊ धारण करना अर्थात आत्म संयम का संस्कार होना माना जाता है। इस संस्कार से व्यक्ति का दूसरा जन्म हुआ माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति आत्म संयमी है, वही संस्कार से दूसरा जन्म पाता है। पंडित वेद प्रकाश मिश्रा ने कहा कि वर्तमान समय में श्रावणी उपाकर्म परंपरा भी विलुप्त होती जा रही है। जो ब्राह्मण है अनुष्ठान , यज्ञ करवाते हैं उनको इस परंपरा का ध्यान रखना चाहिए और इस परंपरा की शिक्षा आगे आने वाली पीढ़ी को भी देना चाहिए।

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