जानकारों का मानना है कि स्वामी प्रसाद मौर्य अपने उस तमगे और ओहदे को अपने साथ रखना चाहते हैं जो कभी बसपा में उनको मिला हुआ था। लेकिन भाजपा के साथ जाकर उनकी पकड़ और धमक न सिर्फ धीमी हुई बल्कि बहुत लंबे समय तक ऐसे ही हालातों में बने रहने पर उनकी अपनी जमीनी पकड़ भी कमजोर हो सकती थी...