कभी राजनीतिक रणनीतियों और अहम फैसलों का केंद्र रहा यह कॉम्प्लेक्स आज खंडहर में तब्दील हो गया है। वर्षों तक यहां सत्ता और विपक्ष दोनों के नेताओं की मीटिंगें होती थीं, चुनावी समीकरण तय किए जाते थे और स्थानीय राजनीति की दिशा यहीं से तय होती थी। लेकिन वक्त ने करवट ली और हालात पूरी तरह बदल गए।
2014 में जब पहली बार इस कॉम्प्लेक्स के ध्वस्तीकरण के आदेश जारी हुए थे, तब तमाम राजनीतिक दल एकजुट होकर मैदान में उतर आए थे। नेताओं ने प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, प्रदर्शन हुए, ज्ञापन सौंपे गए और आखिरकार उस समय कॉम्प्लेक्स को बचा लिया गया था। उस वक्त इसे जनता की आवाज की जीत कहा गया था।
लेकिन इस बार हालात अलग हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कार्रवाई हुई तो कोई भी नेता धरातल पर नहीं उतरा। जिन चेहरों ने कभी इस मुद्दे पर एक मंच साझा किया था, वे अब गायब नजर आए। सोशल मीडिया पर जरूर कई नेताओं ने संवेदनाएं व्यक्त कीं, व्यापारियों के नुकसान पर दुख जताया, लेकिन वास्तविक समर्थन कहीं दिखाई नहीं दिया। व्यापारियों के अनुसार, “जिन पर हम भरोसा करते थे, वे आज मौन हैं।”
कॉम्प्लेक्स का ध्वस्तीकरण सिर्फ एक इमारत का गिरना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक परंपरा के अंत का प्रतीक बन गया है जो कभी जनता के साथ खड़ी दिखाई देती थी।