अज्ञातवास के दौरान धर्मराज युधिष्ठिर ने लोधेश्वर महादेव की स्थापना की थी। इस दौरान महाराज युधिष्ठिर अपनी मां कुंती के साथ आए थे और अज्ञातवास के दौरान उन्होंने कुछ समय यही पर बिताया था। उसी स्थान को अब कुरुक्षेत्र के नाम से जाना जाता है। इसके बाद बावजूद उपेक्षा के चलते ऐतिहासिक धरोहर वाला कुरुक्षेत्र का इलाका उपेक्षित पड़ा है। महादेवा के प्रधान पुरोहित पुजारी गोविंद शास्त्री ने बताया श्री लोधेश्वर महादेवा से डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित आश्रम कुरुक्षेत्र अपने तमाम संस्कृति विरासत समेटे हैं, मान्यता है कि द्वापर युग में कौरवों द्वारा रचित षड्यंत्र (लक्षाग्रह) से बच निकलने के बाद पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान अपना कुछ समय यहां बिताया था। उस दौरान माता कुंती के कहने पर पांडवों ने यहां यज्ञ कुंड (अब अभहरण)का निर्माण भी कराया था। इसके बाद श्री लोधेश्वर महादेवा में शिवलिंग की स्थापना के लिए यज्ञ का आयोजन हुआ था। इस अभरन सरोवर में 50 मीटर दूर एक प्राचीन कुआं भी स्थित है। जिसे पांडवों कूप के नाम से जाना जाता है। इसके पानी में औषधीय गुण है,लोगों का दावा है कि इस पानी के सेवन से त्वचा रोग, पथरी, मोटापा और गंभीर बीमारी ठीक हो जाती हैं।यहां पर एक सरोवर है,जिसमें स्नान करने से चर्म रोग सहित त्वचा रोग से होने वाली बीमारियों से छुटकारा मिलता है।