“अगर जज्बा हो तो कोई बीमारी या कठिनाई इंसान को रोक नहीं सकती। मैं अंग प्रत्यारोपण के बाद भी यह साबित करना चाहता था कि ज़िंदगी हार मानने के लिए नहीं, लड़ने के लिए होती है।”... यह कहना है बाराबंकी के बलवीर सिंह का, जिन्होंने जर्मनी में आयोजित वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व कर बैडमिंटन प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता। यह उनकी पांचवीं अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि है। वह देश का प्रतिनिधित्व करते हुए बैडमिंटन में दो बार स्वर्ण पदक भी जीत चुके हैं। रविवार को अमर उजाला कार्यालय पहुंचे बलवीर ने बताया कि 2009 में जब डॉक्टरों ने कहा कि मेरी दोनों किडनियां खराब हो चुकी हैं, तो जीवन जैसे ठहर गया। मेरी 45 बार डायलिसिस हुई। 2011 में प्रत्यारोपण हुआ और मुझे किसी अज्ञात दाता का जीवन-तोहफा मिला। तब मैंने खुद से वादा किया कि अब इस ज़िंदगी को रुकने नहीं दूंगा। खेल ही मेरी सांसों की ताकत बनेगा। बलवीर ने बताया कि जब उनकी किडनी ट्रांसप्लांट का समय आया तो उनके भाई जगवीर सिंह ने कर्ज लेकर उनका सहयोग किया और हमेशा साथ देते रहे। बलवीर ने यह भीस्वीकार किया कि इस कठिन सफर में उनकी पत्नी ममता सिंह और परिवार ने सबसे बड़ी ताकत दी। कई बार डायलिसिस के बाद मैं टूट जाता था, लेकिन मेरी पत्नी ने कभी मेरा हौसला गिरने नहीं दिया। परिवार के सहयोग के बिना मैं यहां तक नहीं पहुंच पाता। हर पदक सिर्फ मेरा नहीं है, यह मेरी पत्नी, बच्चों और पूरे परिवार का है। असल में यह माता पिता का आशीर्वाद है उन्होंने भावुक होते हुए कहा। “मैंने सीखा है कि इंसान का असली साथी उसका जज्बा और परिवार होता है। अंगदान करने वाले लोग असली हीरो हैं। अगर वो न होते तो आज मैं भी न होता। मेरी जीत दरअसल मानवता की जीत है। डीएम ने की सराहना, दिलाएंगे गौरव सम्मान जिलाधिकारी शशांक त्रिपाठी ने कहा कि बलवीर की उपलब्धि पूरे जिले के लिए गर्व की बात है। उन्हें उत्तर प्रदेश गौरव सम्मान दिलाने के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा जा रहा है और उनके प्रमोशन पर भी विचार होगा। वे युवाओं के लिए प्रेरणादायक हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर परचम 2015, अर्जेंटीना : स्वर्ण और कांस्य पदक। 2017, स्पेन : बैडमिंटन एकल में स्वर्ण। 2019, यूनाइटेड किंगडम : खराब तबीयत के बावजूद रजत। 2023, ऑस्ट्रेलिया : शानदार प्रदर्शन। 2025, जर्मनी : हंगरी व ग्रेट ब्रिटेन के खिलाड़ियों को हराकर कांस्य।