बाराबंकी रेलवे स्टेशन से रोजाना सैकड़ों की संख्या में ट्रेनें गुजरती हैं। लाखों यात्री आते-जाते हैं। यहां यदि किसी यात्री की तबीयत बिगड़ जाए तो उसके इलाज के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। स्टेशन परिसर में बना रेलवे अस्पताल केवल नाम का अस्पताल बनकर रह गया है। अमर उजाला की टीम बृहस्पतिवार को रेलवे अस्पताल पहुंची। वहां चौंकाने वाला नजारा दिखा। अस्पताल तो खुला था, लेकिन अंदर डॉक्टर मौजूद नहीं मिले। डॉक्टर के कमरे की कुर्सी खाली पड़ी मिली। परिसर में तीन कर्मचारी मौजूद थे। टीम ने अस्पताल में प्रवेश करना चाहा तो कर्मचारियों ने रोक दिया। ताकि, हकीकत लोगों तक ना पहुंचे। एक कर्मचारी ने अपना नाम महेंद्र (फार्मासिस्ट) बताया। जब उनसे पूछा गया कि डॉक्टर कहां हैं, तो उन्होंने साफ कहा कि डॉक्टर नहीं हैं। अगले सवाल- मरीजों को कौन देखता है, तो जवाब मिला कि डॉक्टर ही नहीं हैं, तो मरीज कहां से आएंगे। इसके अलावा परिसर में गंदगी और सड़ी-गली गंध फैली थी वो अलग। यहां तक कि अस्पताल के अंदर ही कूड़ा जलाया गया था। मरीजों की सुविधा के लिए रखे स्ट्रेचर और बेंचों पर धूल की मोटी परत जम चुकी है। बताया गया कि इस अस्पताल की मॉनीटरिंग लखनऊ से होती है। बाराबंकी स्टेशन प्रशासन के पास अस्पताल से जुड़ा कोई अधिकार नहीं है। यही वजह है कि कोई अधिकारी यह तक बताने की स्थिति में नहीं था कि डॉक्टर ड्यूटी पर क्यों नहीं आए।