जिंदगी भर जिन लावारिस शवों का कोई अपना नहीं था, उन्हें शरीफ चाचा ने अपना समझकर अंतिम विदाई दी। पहचान से लेकर अंतिम संस्कार तक की जिम्मेदारी उठाई और करीब 28 हजार अनजान चेहरों को सम्मान के साथ विदा किया। उनकी इसी इंसानियत को देश ने सलाम किया और वर्ष 2021 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया लेकिन आज वही शरीफ चाचा जिंदगी के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां सम्मानों से सजी दीवारों के बीच इलाज के लिए पैसों की कमी से जूझना पड़ रहा है। रिकाबगंज क्षेत्र के खिड़कीअली बेग मोहल्ले के रहने वाले शरीफ चाचा के परिवार को करीब एक साल से वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिली है।