हर साल बाढ़ की विभीषिका झेलने वाले टांडा के माझा उल्टहवा गांव के लोग सिर्फ कुदरत की मार नहीं, बल्कि सिस्टम की अनदेखी का दर्द भी झेल रहे हैं। नदी तो हर बरस इन पर कहर बनकर टूट जाती है, लेकिन सरकार की योजनाएं कभी इस गांव का दरवाजा तक नहीं खटखटातीं। वर्षों से जमीन पर खेती कर रहे लोग आज भी कागजों में गैर-मौजूद हैं। न जमीन का कोई रिकॉर्ड, न घरौनी और न ही सरकारी योजनाओं में जगह। जैसे पूरा गांव नक्शे से ही गायब हो। विकास के नाम पर सिर्फ वादे हैं, हकीकत में खाली हाथ। टांडा तहसील मुख्यालय से करीब चार किलोमीटर दूर सरयू नदी के दूसरे छोर पर बस्ती जिले की सीमा में बसे माझा उल्टहवा ग्राम पंचायत के ढाई हजार लाेगों की समस्याएं अपरंपार हैं। इस ग्राम पंचायत में जालिम का पुरवा, कुसमौलिया, दिलशेर का पुरवा, क्योटाही, बाबूराम कोटेदार का पुरवा, सत्तहवा और सरपताही मजरे शामिल हैं। यहां के लोग आज भी मुख्य रूप से खेती और पशुपालन पर ही निर्भर हैं। बावजूद इसके आज तक इनकी खेती योग्य भूमि के कोई दस्तावेज टांडा तहसील प्रशासन के पास उपलब्ध नहीं हैं। बस्ती जिले की सदर तहसील से कुछ लोगों को हस्तलिखित खतौनी दी जाती है जो आज के समय में कोई मायने नहीं रखती है। ई खतौनी के बिना इन्हें कृषि, उद्यान, मत्स्य समेत अन्य तमाम विभागों से किसी भी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है। संपत्ति अधिकारी पत्र (घरौनी) जैसी महत्वाकांक्षी योजना का लाभ भी आज तक किसी परिवार को नहीं मिल पाया है। आलम यह है कि अगर कोई भूमि संबंधित विवाद हो जाए तो इसका निस्तारण कराने को यह किसी के सामने कोई साक्ष्य नहीं प्रस्तुत कर सकते हैं। ऐसा नहीं है कि इन्होंने इसके लिए कोई आवाज नहीं उठाई लेकिन हर पटल पर इसे अनसुना कर दिया गया।