सम्राट हर्षवर्धन के काल में संगम पर लगने वाले कुंभ मेला को वैश्विक आधार और सांस्कृतिक लोकप्रियता मिली। दुनिया में फैली इस त्याग संस्कृति का उल्लेख चीनी यात्री ह्वेनसांग और फाह्यान ने भी आदर के साथ किया है। विदेशी इतिहासकारों ने लिखा है कि सम्राट हर्षवर्धन कुंभ में अपने खजाने का सारा धन वितरित कर देते थे। यानी हमारी कभी संचय की प्रवृत्ति नहीं रही है। देश के दूसरे हिस्सों में पांडित्य और शास्त्रार्थ की संस्कृति फलती-फूलती रही है, लेकिन प्रयागराज में ज्ञान की संस्कृति रही है। इसी ज्ञान-आध्यात्म की संस्कृति से परिचित होने के लिए पूरा विश्व महाकुंभ में उमड़ पड़ता है।