अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के सुन्नी थियोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रेहान अख्तर क़ासमी ने अलविदा जुमे की अहमियत बताते हुए कहा कि रमजान का यह आखिरी जुमा मुसलमानों के लिए विशेष इबादत और आत्मचिंतन का दिन होता है। उन्होंने बताया कि जकात और सदका इस्लाम में जरूरतमंदों की मदद का अहम जरिया हैं और ईद‑उल‑फितर से पहले इन्हें अदा करना जरूरी माना गया है, ताकि गरीब और जरूरतमंद लोग भी ईद की खुशियों में शामिल हो सकें। उन्होंने कहा कि जकात से समाज में बराबरी और सामाजिक न्याय की भावना मजबूत होती है। इसलिए हर सक्षम व्यक्ति को अपनी मालियत के अनुसार जकात और सदका अदा करना चाहिए। अलविदा जुमे की नमाज के बाद लोगों ने देश-दुनिया में शांति, भाईचारे और खुशहाली के लिए दुआ की। मस्जिदों के आसपास प्रशासन की ओर से सुरक्षा और यातायात की विशेष व्यवस्था भी की गई थी, ताकि नमाजियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।