इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) में एडवांस तकनीक से लैब में हाइब्रिड भ्रूण तैयार होगा। इससे बच्चों को विरासत में मां-बाप की बीमारियां नहीं मिलेंगी। शारीरिक और मानसिक दिव्यांगता से भी बचाव होगा। फतेहाबाद रोड स्थित होटल में एकेडमी ऑफ क्लीनिकल एम्ब्रियोलॉजिस्ट की कार्यशाला में विशेषज्ञों ने नई तकनीक की जानकारी दी। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) मुंबई के चिकित्सा विज्ञानी डॉ. दीपक मोदी ने बताया कि दंपती के शुक्राणु-अंडाणुओं की जेनेटिक जांच से दंपती के शारीरिक-मानसिक दिव्यांग, थैलेसीमिया, एप्लास्टिक एनीमिया, कैंसर समेत अन्य कोई बीमारी की पता कर सकते हैं। ऐसे शुक्राणु-अंडाणुओं को छोड़कर स्वस्थ से लैब में भ्रूण विकसित कर सकते हैं। नई दिल्ली की एकेडमी के अध्यक्ष डॉ. गौरव मजूमदार ने बताया कि अभी तक भ्रूण विकसित होने के बाद बीमारियों की जांच की जाती है। अब जेनेटिक जांच से पहले ही पता कर सकते हैं कि दंपती या इनके परिवार में किसी बीमारी की हिस्ट्री तो नहीं है। इसमें कैंसर, टीबी, मानसिक दिव्यांगता से बचाव के लिए ऐसा ही भ्रूण विकसित करते हैं, जो इन बीमारियों से अछूता रहे। यहां तक भविष्य में होने वाली गंभीर रोगों से भी बचाया जा सकता है। आयोजन सचिव डॉ. केशव मल्होत्रा और डॉ. नरेंद्र मल्होत्रा ने बताया कि भारत सरकार को आयुष्मान कार्ड योजना में आईवीएफ को शामिल करने की मांग भेजी है। डॉ. जयदीप मल्होत्रा को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया गया। केंद्रीय राज्यमंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल ने कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए कहा कि रामायण-महाभारत में भी इस तकनीक का जिक्र है। आईवीएफ तकनीकी से पहले लोग हमारे ग्रंथों में लिखी बातों का मजाक बनाते थे, अब वैज्ञानिक रूप से ये साबित हो रहा है। कार्यशाला में डॉ. राजीव शर्मा, डॉ. नवल शाह, डॉ. निहारिका मल्होत्रा, डॉ. रजनी पचौरी, डॉ. अंबुज गुप्ता, डॉ. रिचा सिंह, डॉ. किया पाराशर, डॉ. मीनल जैन आदि भी रहे। संस्था सचिव केरल के डॉ. परशुराम गोपीनाथ ने बताया कि प्लांड मैरिज से भी बांझपन बढ़ रहा है। कॅरिअर के चलते अधिकांश युवक-युवतियों ने 30-32 की उम्र में शादी और 35 या इसके बाद बच्चे की योजना बनाते हैं। बढ़ी उम्र में शुक्राणु-अंडाणुओं की गुणवत्ता खराब मिल रही है। निवर्तमान अध्यक्ष डॉ. सुजाता रामकृष्णन ने बताया कि ऐसे युवक-युवती शुक्राणु-अंडाणु फ्रीज करा रहे हैं। इनको 10 साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है।