अलवर के आरती बालिका गृह में रह रही 12 वर्षीय बालिका की ब्रेन टीबी से मौत के मामले में गंभीर लापरवाही सामने आई है। राज्य सरकार ने प्रारंभिक जांच में बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी), आरती बालिका गृह के संचालक और बाल अधिकारिता विभाग के सहायक निदेशक को दोषी माना है।
इसके तहत सीडब्ल्यूसी अध्यक्ष राजेश शर्मा और दो सदस्य, भूपेंद्र सैनी और सुरज्ञान जाट को हटा दिया गया है। साथ ही, आरती बालिका गृह का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, और बाल अधिकारिता विभाग के सहायक निदेशक रविकांत के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा रही है। बालिका गृह को नोटिस जारी कर सात दिन के भीतर जवाब मांगा गया है।
जिला कलेक्टर आर्तिका शुक्ला के निर्देश पर तहसीलदार रश्मी शर्मा ने आरती बालिका गृह का निरीक्षण किया, जहां बालिकाओं के स्वास्थ्य, खानपान, सफाई और रहने की व्यवस्थाओं का जायजा लिया गया। राज्य सरकार के स्तर पर शनिवार देर रात तक बालिका गृह का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की प्रक्रिया पूरी होने की संभावना है।
फिलहाल, इस बालिका गृह में 60 बालिकाएँ रह रही हैं, जिन्हें अब जयपुर स्थित बालिका गृह में शिफ्ट किया जाएगा। हालांकि, जिले में पांच अन्य बालिका गृह हैं, लेकिन विभिन्न कारणों से इन बालिकाओं को वहां नहीं भेजा जा सकता।
इलाज में लापरवाही के आरोप
बालिका की मौत दो दिन पहले ब्रेन टीबी के कारण हुई थी। डॉक्टरों ने 31 जनवरी को ही उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए जयपुर रेफर करने की सिफारिश की थी, लेकिन इसके बावजूद उसे 12 दिनों तक अलवर में ही रखा गया।
सीडब्ल्यूसी को किसी आदेश की प्रतीक्षा किए बिना ही बालिका के इलाज का निर्णय लेने की स्वतंत्रता थी, फिर भी आवश्यक कदम नहीं उठाए गए। 10 फरवरी की शाम, बालिका गृह के संचालक चेतराम ने बाल अधिकारिता विभाग के सहायक निदेशक को ईमेल भेजकर बालिका को जयपुर ले जाने की अनुमति मांगी थी, लेकिन उस मेल पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। संचालक चाहें तो फोन या व्हाट्सऐप के जरिए भी अनुमति ले सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
बाल अधिकारिता विभाग के सहायक निदेशक ने भी मामले को गंभीरता से नहीं लिया और बालिका को जयपुर ले जाने के संबंध में कोई जवाब नहीं दिया। इस लापरवाही के कारण ही बालिका का समय पर इलाज नहीं हो सका, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।