उमरिया जिले में जनपद पंचायत मानपुर के ग्राम पंचायत कुशमाहा के ग्रामीणों ने अपने अधिकारों के लिए बड़ा आंदोलन शुरू कर दिया है। विस्थापन के खिलाफ आवाज उठाते हुए ग्रामीणों ने प्रशासन की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जिला पंचायत सीईओ अभय सिंह ओहरिया ने जनप्रतिनिधियों और सरपंचों से चर्चा की। वहीं, मामले को समझने और समाधान निकालने के लिए वन परिक्षेत्र अधिकारी रंजन सिंह परिहार और एसडीएम एस नाग को भी मौके पर बुलाया गया।
सीईओ अभय सिंह ओहरिया ने ग्रामीणों को समझाने का प्रयास किया कि ग्राम पंचायत कुशमाहा के 147 आवेदनों पर विचार किया गया, लेकिन यह क्षेत्र बफर ज़ोन में होने के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह इलाका विस्थापन की प्रक्रिया में है और सरकार चाहती है कि ग्रामीण मुआवजा लेकर अन्यत्र बस जाएं, जिससे वे सभी सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा सकें।
ग्रामीणों का आक्रोश, मुआवजा अस्वीकार्य
प्रशासन की इस दलील को ग्रामीणों ने पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया। उन्होंने इसे जबरन विस्थापन की साजिश बताया और सरकार की नीति का कड़ा विरोध किया। वार्ड क्रमांक 11 की जनपद सदस्य सुश्री रोशनी सिंह और ग्राम पंचायत कुशमाहा के सरपंच सुरेंद्र प्रताप सिंह ने ग्रामीणों के पक्ष में खड़े होकर प्रशासन के खिलाफ आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी।
ग्रामीणों ने कहा कि यदि उनकी मांगे नहीं मानी जातीं, तो वे स्वेच्छा से सरकारी योजनाओं, बिजली, राशन कार्ड और अन्य सरकारी सुविधाओं का त्याग कर देंगे। उनका सवाल था कि जब चुनाव आते हैं, तो अधिकारी उन्हें मतदान के अधिकार की याद दिलाते हैं, लेकिन मूलभूत सुविधाओं के मामले में उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है।
यह भी पढ़ें: झूला झूलते समय 11 वर्षीय बालक की दर्दनाक मौत, सोहागपुर में मचा हड़कंप
क्या 15 लाख मुआवजा पर्याप्त है?
ग्रामीणों का कहना है कि सरकार द्वारा दिया जा रहा 15 लाख रुपये का मुआवजा बेहद कम है। उन्होंने तर्क दिया कि क्या कोई सरकारी अधिकारी या कर्मचारी इतनी रकम लेकर अपनी नौकरी छोड़ने को तैयार होगा? अगर नहीं, तो फिर वे क्यों अपने जल, जंगल और जमीन को छोड़ दें?
यह भी पढ़ें: ओलावृष्टि से फसल नुकसान का कांग्रेस ने लिया जायजा, प्रभावित किसानों को मुआवजा दिलाने की मांग
विस्थापन विरोध बना प्रशासन के लिए चुनौती
यह आंदोलन प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। ग्रामीण साफ कह चुके हैं कि वे विस्थापन के खिलाफ संघर्ष जारी रखेंगे और किसी भी हाल में अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे। प्रशासन के सामने अब सवाल है कि क्या वह अपनी विस्थापन योजना पर पुनर्विचार करेगा, या फिर ग्रामीणों को उनकी ज़मीन से जबरन हटाया जाएगा? आने वाले दिनों में इस संघर्ष का क्या परिणाम होगा, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। लेकिन फिलहाल, ग्रामीणों का विरोध प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है।