फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राख में दबे सपने: विकासनगर में जल गई जिंदगी, अब यादें टटोल रहे हाथ; दूसरे दिन भी नहीं पहुंची राहत

विकासनगर की उस बस्ती में अब धुआं तो थम गया है, लेकिन दर्द अब भी सुलग रहा है। बुधवार की आग ने सिर्फ झोपड़ियां नहीं जलाईं। उसने लोगों की पूरी जिंदगी, उनकी यादें और उनके सपनों को राख में बदल दिया। बृहस्पतिवार की सुबह यहां का मंजर और भी ज्यादा मार्मिक था। राख के ढेर में झुके लोग अपने हिस्से की जिंदगी तलाश रहे थे। कोई अपने बेटे-बेटी की अधजली किताबें समेट रहा था, तो कोई घर-गृहस्थी के बचे-खुचे निशान खोज रहा था। इस बस्ती में रहने वाले ज्यादातर परिवार मजदूरी कर पेट पालते हैं। वर्षों की मेहनत से तिनका-तिनका जोड़कर जो गृहस्थी खड़ी की थी, वह चंद मिनटों में राख हो गई। किसी की बाइक जलकर खाक हो गई, तो किसी के मवेशी असमय काल के गाल में समा गए। आग ने सिर्फ सामान नहीं, पहचान भी छीन ली। करीब 95 प्रतिशत लोगों के आधार कार्ड, बैंक पासबुक, ड्राइविंग लाइसेंस, बाइक-स्कूटी के कागजात समेत जरूरी दस्तावेज जलकर खत्म हो गए। अब इनके सामने सिर्फ रहने और खाने का संकट ही नहीं, बल्कि अपनी पहचान साबित करने की चुनौती भी खड़ी है। खुले आसमान के नीचे, भूख और बेबसी के साथ दूसरे दिन भी हालात नहीं बदले। तपती धूप, खाली पेट और आंखों में अनिश्चित भविष्य—यही अब इन परिवारों की सच्चाई है। पीड़ितों का कहना है कि अभी तक प्रशासन की ओर से कोई ठोस मदद नहीं मिली है। इंसानियत जिंदा है, सिस्टम गायब जब सरकारी मदद नहीं पहुंची, तो आसपास के लोग आगे आए। कोई खाना दे रहा है, कोई पानी, कोई बच्चों के लिए बिस्किट। छोटी-छोटी मददें ही इस वक्त इन परिवारों का सहारा बनी हुई हैं। बताते चलें कि बुधवार शाम लगी आग ने करीब 1200 झोपड़ियों को निगल लिया। सिलिंडरों के धमाकों ने तबाही को और बढ़ा दिया था। पीड़ित परिवारों का कहना है कि फायर ब्रिगेड वहां करीब डेढ़ घंटे बाद मौके पर पहुंची। लोगों का कहना है कि अगर समय से फायर ब्रिगेड कदमकल दस्ता पहुंच जाता तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता था। अब यह सिर्फ पुनर्वास का मामला नहीं, बल्कि उन जिंदगियों को फिर से खड़ा करने की चुनौती है, जिनकी नींव ही राख में बदल चुकी है।

विज्ञापन

Latest

Recommended

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
AU ऐप में पढ़ें