ढाका में एक तस्वीर सामने आती है… एक औपचारिक मंच, कैमरों की चमक और एक पल का हाथ मिलाना। लेकिन सवाल ये है क्या ये महज शिष्टाचार था या इसके पीछे छुपा है कोई बड़ा कूटनीतिक संदेश?
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और पाकिस्तान की संसद के स्पीकर अयाज सादिक के बीच हाथ मिलते ही पाकिस्तान जश्न में क्यों डूब गया? क्या ऑपरेशन सिंदूर के बाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग पड़ा पाकिस्तान अब प्रतीकों के सहारे अपनी साख बचाने की कोशिश कर रहा है?
और इससे भी बड़ा सवाल- जब भारत-पाक रिश्ते तनाव के दौर से गुजर रहे हैं, तब ढाका अचानक दक्षिण एशियाई कूटनीति का केंद्र क्यों बन गया? एक तरफ़ पाकिस्तान के नेता ढाका पहुंच रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ भारत के विदेश मंत्री ऐसे समय में बांग्लादेश पहुंचे हैं, जब वहां की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है।
क्या खालिदा जिया को दी गई श्रद्धांजलि महज़ औपचारिकता है? या फिर भारत बांग्लादेश में सत्ता के संभावित नए चेहरों से भविष्य की राह तैयार कर रहा है?
क्या BNP के साथ बढ़ता संवाद भारत की बदली हुई रणनीति का संकेत है? और सबसे अहम- क्या ढाका में खिंची ये तस्वीरें आने वाले महीनों में दक्षिण एशिया की सियासत की दिशा तय करेंगी?
ढाका में बुधवार को एक औपचारिक कार्यक्रम के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के स्पीकर अयाज़ सादिक़ के बीच हुआ महज एक शिष्टाचार भरा हाथ मिलाना दक्षिण एशियाई राजनीति में बहस का बड़ा विषय बन गया है। जिस घटना को सामान्य राजनयिक शिष्टाचार माना जाना चाहिए था, उसे पाकिस्तान ने अपनी “कूटनीतिक उपलब्धि” के तौर पर पेश करने की कोशिश की। ऑपरेशन सिंदूर के बाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग पड़े पाकिस्तान के लिए यह हाथ मिलाना मानो तिनके का सहारा बन गया।
पाकिस्तान के प्रमुख अख़बार डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी संसद की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया गया कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्वयं आगे बढ़कर अयाज सादिक़ से संपर्क किया और हाथ मिलाया। इतना ही नहीं, बयान में यह भी जोड़ दिया गया कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान लगातार शांति, संवाद और संयुक्त जांच की बात करता रहा है ताकि “बिना उकसावे के आक्रामकता” रोकी जा सके। भारत के संदर्भ में यह दावा न सिर्फ़ भ्रामक माना जा रहा है, बल्कि पूरी तरह तथ्यहीन भी।
असलियत यह है कि पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान का रुख़ शांति से ज़्यादा उकसावे और बयानबाज़ी वाला रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी नेताओं और सेना की ओर से जिस तरह के आक्रामक बयान आए, उन्होंने इस “शांति प्रेम” के दावों की पोल पहले ही खोल दी थी। ऐसे में ढाका में हुआ एक औपचारिक हाथ मिलाना पाकिस्तान के लिए अपनी घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय छवि को संवारने का मौका बन गया।
2025 की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने भारत-पाक संबंधों को एक बार फिर गहरे तनाव में धकेल दिया। इसके जवाब में भारत ने कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर सख़्त फैसले लिए। 1960 की ऐतिहासिक सिंधु जल संधि में भागीदारी का निलंबन, सीमा पार आवागमन पर रोक और द्विपक्षीय गतिविधियों पर प्रतिबंध इसी कड़ी का हिस्सा थे। भारत ने साफ कर दिया कि जब तक आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई और जवाबदेही नहीं होगी, तब तक सामान्य रिश्तों की कोई गुंजाइश नहीं है।
7 मई, 2025 को शुरू हुआ ऑपरेशन सिंदूर इसी नीति का सैन्य विस्तार था। भारतीय सेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए। इसके बाद पाकिस्तान की हताशा उसके बयानों और अब इस हाथ मिलाने को लेकर की जा रही अतिरंजना में साफ दिखाई देती है।
लेकिन ढाका में जयशंकर की मौजूदगी का दूसरा, और कहीं अधिक महत्वपूर्ण पहलू बांग्लादेश से जुड़ा है। भारत-बांग्लादेश रिश्ते इस वक्त पूरी तरह सामान्य नहीं कहे जा सकते। औपचारिक तौर पर जयशंकर का यह दौरा बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया को श्रद्धांजलि देने के लिए था, लेकिन इसके राजनीतिक और कूटनीतिक संकेत कहीं गहरे हैं।
बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त रियाज हमिदुल्लाह द्वारा साझा की गई एक तस्वीर ने सियासी हलकों में खास हलचल पैदा की। इस तस्वीर में जयशंकर की मुलाकात बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के कार्यकारी अध्यक्ष और खालिदा जिया के बेटे तारिक़ रहमान से होती दिख रही है। आधिकारिक तौर पर इसे शिष्टाचार मुलाकात बताया गया, लेकिन जानकार इसे बांग्लादेश की बदलती राजनीति के संदर्भ में देख रहे हैं।
दरअसल, बांग्लादेश में फरवरी में आम चुनाव प्रस्तावित हैं और इस बार तस्वीर बिल्कुल बदली हुई है। अवामी लीग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया है, जबकि दशकों से भारत की सबसे भरोसेमंद सहयोगी पार्टी वही रही है। शेख़ हसीना के शासनकाल में भारत-बांग्लादेश रिश्तों में गर्मजोशी और रणनीतिक साझेदारी साफ दिखती थी। लेकिन मौजूदा हालात में अवामी लीग विकल्प नहीं रह गई है।
ऐसे में भारत के सामने कूटनीतिक मजबूरी है कि वह उन राजनीतिक ताक़तों से संवाद बढ़ाए, जो भविष्य में सत्ता में आ सकती हैं। BNP, जिसे लंबे समय तक भारत-संदेह की नज़र से देखा जाता रहा, अब एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में उभर रही है। जयशंकर और तारिक़ रहमान की मुलाकात इसी बदले हुए यथार्थ का संकेत मानी जा रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का खालिदा जिया के निधन पर दिया गया संदेश भी इसी दिशा की ओर इशारा करता है। पीएम मोदी ने न सिर्फ़ शोक जताया, बल्कि भारत-बांग्लादेश संबंधों को मज़बूत करने में खालिदा जिया की भूमिका की खुलकर सराहना की। इससे पहले उनकी बीमारी के दौरान भारत की ओर से इलाज में मदद की पेशकश और BNP का सार्वजनिक आभार भी रिश्तों में आई नरमी को दर्शाता है।
यह पहला मौका नहीं है जब भारत ने ढाका में बदले हालात को समझने की कोशिश की हो। दिसंबर 2024 में विदेश सचिव विक्रम मिसरी का अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस से मिलना भी इसी कड़ी का हिस्सा था। उस दौरे को भी भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं की “जमीन टटोलने” के तौर पर देखा गया था।
दिलचस्प यह है कि इसी दौरान पाकिस्तान भी अपने नेशनल असेंबली स्पीकर अयाज़ सादिक़ को ढाका भेज रहा है। इससे साफ है कि बांग्लादेश इस वक्त दक्षिण एशियाई कूटनीति का एक अहम केंद्र बन चुका है, जहां भारत और पाकिस्तान दोनों अपनी-अपनी रणनीति आज़मा रहे हैं।
कुल मिलाकर, ढाका में जयशंकर की मौजूदगी दो अलग-अलग संदेश देती है। एक ओर पाकिस्तान की बेचैनी और हताशा, जो एक हाथ मिलाने को भी बड़ी जीत के रूप में पेश कर रही है। दूसरी ओर भारत की बदली हुई, अधिक व्यावहारिक कूटनीति, जो बांग्लादेश में नए सियासी यथार्थ को स्वीकार कर आगे की तैयारी में जुट गई है। खालिदा जिया को श्रद्धांजलि के साथ यह दौरा इस बात का संकेत है कि भारत आने वाले समय में बांग्लादेश के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने जा रहा है।