करीब 20 दिनों के विदेश दौरे के बाद राहुल गांधी देश लौट आए हैं। लेकिन इस बार वापसी के साथ उन्हें राहत नहीं, बल्कि एक के बाद एक कई राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना है। पंजाब में कांग्रेस की अंदरूनी कलह, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ सीटों का समीकरण, गोवा में संगठनात्मक असंतोष और कुछ ही दिनों बाद शुरू होने वाला संसद का मानसून सत्र। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी इन सभी मोर्चों पर पार्टी को संभाल पाएंगे?
करीब तीन सप्ताह के अवकाश के बाद सोमवार को राहुल गांधी भारत लौट आए। कांग्रेस ने उनके विदेश दौरे को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की, हालांकि पार्टी सूत्रों के मुताबिक वह यूरोप के दौरे पर थे। हमेशा की तरह इस बार भी भाजपा ने राहुल गांधी की विदेश यात्रा को लेकर सवाल उठाए हैं।
लेकिन अब राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी संगठन को चुनावी मोड में लाना है। आने वाले कुछ महीनों में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और कांग्रेस तीन अहम राज्यों पंजाब, उत्तर प्रदेश और गोवा में संगठनात्मक चुनौतियों से जूझ रही है।
सबसे बड़ी चुनौती पंजाब कांग्रेस की है। यहां पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की अगुवाई में कई वरिष्ठ नेता प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजा वडिंग को हटाने की मांग कर रहे हैं। हालांकि प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल कई बार साफ कर चुके हैं कि नेतृत्व में कोई बदलाव नहीं होगा।
माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर कांग्रेस नेतृत्व के स्तर पर कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन विवाद सुलझने की बजाय और गहरा गया है। अगर पार्टी नेतृत्व चन्नी की मांग मानता है तो उसके फैसलों की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं, और अगर मांग नहीं मानी जाती तो पंजाब में गुटबाजी और बढ़ने की आशंका बनी रहेगी।
उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस के लिए राजनीतिक समीकरण आसान नहीं हैं। पार्टी समाजवादी पार्टी के साथ सीट बंटवारे को लेकर बातचीत शुरू होने का इंतजार कर रही है। इसी बीच कांग्रेस के भीतर से गठबंधन में बराबरी की हिस्सेदारी की मांग उठ रही है, जबकि कांग्रेस सांसद इमरान मसूद लगातार समाजवादी पार्टी और उसके नेतृत्व पर तीखे बयान दे रहे हैं।
चर्चा यह भी है कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस में संगठनात्मक बदलाव हो सकते हैं और प्रदेश अध्यक्ष के पद पर नया चेहरा सामने आ सकता है। वहीं गोवा में हाल ही में गिरीश चोदनकर को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद पूर्व अध्यक्ष अमित पाटकर की नाराजगी की खबरें सामने आई हैं। ऐसे में राहुल गांधी को तीनों राज्यों में संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की चुनौती का सामना करना होगा।
संगठन के अलावा राहुल गांधी जल्द ही अपने राजनीतिक अभियान को भी नई रफ्तार देने वाले हैं। 17 जुलाई को वह उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में "छात्रों की गूंज" अभियान के कार्यक्रम को संबोधित करेंगे। इस अभियान के जरिए कांग्रेस पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था के मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरने की तैयारी कर रही है।
इस अभियान की शुरुआत इससे पहले राजस्थान के कोटा से हुई थी। अब देहरादून के बाद इसे देश के अन्य शहरों तक ले जाने की योजना है। कांग्रेस नौ अगस्त को दिल्ली में बड़ी रैली आयोजित करने की तैयारी भी कर रही है।
इसी बीच 20 जुलाई से संसद का मानसून सत्र भी शुरू होने जा रहा है। विपक्ष राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी, पेपर लीक और अन्य मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है। दूसरी ओर भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ राजनीतिक ताकत बढ़ाने में जुटी है।
ऐसे में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी की भूमिका और भी अहम हो जाएगी। संसद के भीतर विपक्ष को एकजुट रखना और सरकार को प्रभावी ढंग से घेरना उनके लिए बड़ी राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा है।
विदेश दौरे से लौटने के बाद राहुल गांधी के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। एक ओर पार्टी के भीतर असंतोष को संभालना है, दूसरी ओर चुनावी राज्यों में संगठन को मजबूत करना है। इसके साथ ही पेपर लीक जैसे मुद्दों पर राजनीतिक अभियान चलाना और संसद में विपक्ष की रणनीति का नेतृत्व करना भी उनकी जिम्मेदारी होगी। ऐसे में आने वाले कुछ सप्ताह न सिर्फ राहुल गांधी, बल्कि कांग्रेस की चुनावी तैयारियों की दिशा भी तय कर सकते हैं।