पश्चिम बंगाल की सियासत में सत्ता परिवर्तन का असर अब ज़मीन पर साफ दिखाई देने लगा है. दक्षिण 24 परगना की चर्चित फलता विधानसभा सीट पर टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनावी मैदान से पीछे हटने का ऐलान कर दिया है. यह वही सीट है जहां चुनावी हिंसा और गड़बड़ी के आरोपों के बाद 29 अप्रैल को हुई वोटिंग रद्द कर दी गई थी और अब 21 मई को दोबारा मतदान होना है. लेकिन मतदान से ठीक पहले जहांगीर खान के इस फैसले ने बंगाल की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है.
फलता सीट पिछले करीब 15 वर्षों से टीएमसी का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है. इस बार यहां मुकाबला टीएमसी के जहांगीर खान और बीजेपी उम्मीदवार देवांग्शु पांडा के बीच माना जा रहा था. लेकिन 4 मई को आए चुनाव नतीजों में बंगाल की सत्ता बदल गई और बीजेपी सरकार बनने के बाद फलता का पूरा राजनीतिक समीकरण बदलता नजर आया.
जहांगीर खान ने मंगलवार दोपहर अचानक चुनावी मैदान छोड़ने का ऐलान कर दिया. हालांकि उनके हटने के बावजूद 21 मई को मतदान तय कार्यक्रम के मुताबिक ही होगा, क्योंकि इस सीट पर सीपीएम के शंभू कुर्मी और कांग्रेस के अब्दुर रज्जाक भी चुनाव मैदान में मौजूद हैं. लेकिन राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि जहांगीर खान के हटने से बीजेपी उम्मीदवार की राह काफी आसान हो गई है.
सत्ता बदलने के बाद फलता में प्रशासनिक और पुलिसिया कार्रवाई का रुख भी तेजी से बदला. इलाके में भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है. मुख्यमंत्री बनने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने खुद फलता सीट की कमान संभाल ली थी. उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार के समर्थन में बड़ी रैली करते हुए जहांगीर खान पर सीधा हमला बोला था. शुभेंदु अधिकारी ने कहा था कि “जो खुद को पुष्पा कहता है, अब उसकी जिम्मेदारी मेरे ऊपर है.” उन्होंने लोगों से बिना डर के वोट डालने और बीजेपी को भारी मतों से जिताने की अपील भी की थी.
दरअसल, चुनाव प्रचार के दौरान जहांगीर खान अपने दबंग अंदाज और बयानों की वजह से लगातार सुर्खियों में थे. चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के चर्चित आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा को फलता का पर्यवेक्षक बनाकर भेजा था. इलाके में पहुंचकर अजय पाल शर्मा ने साफ कहा था कि “जहांगीर खान से कह देना, गुंडागर्दी नहीं चलने दूंगा.”
इसके जवाब में जहांगीर खान ने एक जनसभा में फिल्मी अंदाज में कहा था, “अगर तुम सिंघम हो, तो मैं पुष्पा हूं… पुष्पराज, झुकेगा नहीं.” यह बयान सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ था और जहांगीर खान की कई रील्स भी चर्चा में रहीं. लेकिन अब वही ‘पुष्पा’ वोटिंग से ठीक पहले चुनावी मैदान छोड़ चुका है.
बीजेपी सरकार बनने के बाद जहांगीर खान और उनके करीबी सहयोगियों पर कानूनी दबाव भी बढ़ा. उनके करीबी और फलता पंचायत समिति के उपाध्यक्ष सैदुल खान पर हिंसा और जानलेवा हमले के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई. स्थानीय स्तर पर पुलिस की सख्ती बढ़ने लगी और टीएमसी के बड़े नेता भी प्रचार से दूरी बनाते नजर आए.
इसी बदले माहौल में जहांगीर खान का चुनावी मैदान छोड़ना बंगाल की नई सियासत का बड़ा संकेत माना जा रहा है. अब सबकी निगाहें 21 मई को होने वाले मतदान पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि फलता का किला आखिर किसके हाथ जाता है.