प्रशांत किशोर (पीके) बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार और लालू यादव दोनों को ही राज्य की मौजूदा समस्याओं की जड़ मानते हैं। उनका स्पष्ट मत है कि पिछले 30-35 वर्षों से इन दोनों नेताओं (और उनके इर्द-गिर्द की राजनीति) के शासन ने बिहार को बर्बाद कर दिया है। पीके इन दोनों की राजनीतिक विचारधाराओं को कमोबेश एक जैसा मानते हैं, जो दशकों से सामाजिक न्याय और 'जंगल राज' जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही हैं, लेकिन उन्होंने बिहार के विकास, शिक्षा और रोजगार पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
प्रशांत किशोर लगातार यह बात दोहराते रहे हैं कि लालू और नीतीश ने इतने लंबे समय तक शासन किया है, लेकिन राज्य में कोई मूलभूत सुधार नहीं हुआ। वह आरोप लगाते हैं कि इन नेताओं ने सामाजिक न्याय के नाम पर बिहार की जनता को लूटा है।
उन्होंने बिहार की जनता से अपील की है कि अगर वे फिर से लालू या नीतीश को वोट देते हैं, तो उन्हें फिर से नौकरी के लिए राज्य छोड़कर बाहर (जैसे चेन्नई, गुजरात, दिल्ली, मुंबई) जानवरों की तरह ट्रेनों में यात्रा करनी पड़ेगी। पीके ने लोगों से वोट के बदले पैसे लेने पर भी तंज कसा है और कहा है कि अगर ₹1000-₹2000 में वोट बेचेंगे तो अगले पांच साल तक अधिकारियों के भ्रष्टाचार और जंगल राज को झेलना पड़ेगा।
पीके का कहना है कि बिहार की जनता 35 साल से इन्हीं दो (लालू और नीतीश) विकल्पों में उलझी रही है, और डर के कारण एक दूसरे को वोट देती रही है। उन्होंने कहा कि लोग लालू के डर से नीतीश-मोदी को और मोदी के डर से लालू को वोट देते आए हैं, क्योंकि उनके पास कोई सच्चा विकल्प नहीं था। प्रशांत किशोर ने अपने अभियान 'जन सुराज' को इसी विकल्प के रूप में पेश किया है।प्रशांत किशोर ने लालू यादव पर उनके बच्चों को विधायक, सांसद और मुख्यमंत्री बनाने की चिंता करने का आरोप लगाया है, जबकि आम लोगों के भविष्य की चिंता उन्हें नहीं है। उन्होंने मुस्लिम समुदाय से भी कहा कि "लालटेन में किरासन तेल बन जलते रहेंगे, तो लालू जी के घर रोशनी होगी, लेकिन आपके बच्चों का भविष्य अंधेरे में ही रहेगा।"